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आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः: क्या केवल ज्ञान से जीवन सुधर सकता है?

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आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः इस श्लोक का अर्थ गहन और महत्वपूर्ण है। यह कहता है कि वेद और अन्य पवित्र ग्रंथ भी उस व्यक्ति का उद्धार नहीं कर सकते जो आचारहीन है। भले ही वह व्यक्ति इन ग्रंथों को अच्छी तरह से पढ़ ले, लेकिन उसके जीवन में नैतिकता का अभाव है तो उसका जीवन सफल नहीं हो सकता। श्लोक का अर्थ आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः  - आचारहीन व्यक्ति को वेद भी शुद्ध नहीं कर सकते। अर्थात्, केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना या ग्रंथों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारना भी आवश्यक है। यद्यप्यधीताः सहषभिरङ्गः - भले ही वह व्यक्ति वेदों और अंगों को अच्छे से पढ़े, परंतु यदि वह आचरण में शुद्ध नहीं है, तो पढ़ाई का कोई लाभ नहीं। छन्दांस्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति:  - जैसे पक्षी अपने नीड को छोड़ देते हैं, वैसे ही वेद भी मृत्यु के समय उस व्यक्ति का साथ छोड़ देते हैं। नीडम् शकुन्ता इव जातपक्षाः - जैसे पक्षी जब पंख उग आते हैं तो अपने घोंसले को छोड़ देते हैं, उसी प्रकार वेद भी उस व्यक्ति को छोड़ देते हैं जो आचारहीन है। विचार इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में नैतिकता और आचरण का ...

हिंदुओं की संस्कृति धर्म से बिगड़ी है ?

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धर्म और संस्कृति: भारतीय समाज का आधार भारत एक ऐसा देश है जहाँ धर्म और संस्कृति का अटूट संबंध है। यहाँ की जीवनशैली, परंपराएँ और सामाजिक संरचना इन दोनों तत्वों से गहराई से प्रभावित होती हैं। “धर्मेण गमनमूर्ध्वम्, गमनमधस्तात् भवत्यधर्मेण।” इस सूक्ति में गहराई से यह बात कही गई है कि धर्म के माध्यम से व्यक्ति या समाज उन्नति करता है, जबकि अधर्म के पथ पर चलकर पतन की ओर जाता है। धर्म: आत्मा और समाज का मार्गदर्शक धर्म केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मा और अनात्मा, जीवात्मा और शरीर का विधायक है। यह व्यक्ति के आचरण और समाज के ढांचे को निर्धारित करता है। धर्म के माध्यम से प्रजा का धारयण होता है, अर्थात् समाज को स्थिरता और दिशा मिलती है। संस्कार: विकास की कुंजी संस्कार हर जीवात्मा और शरीर का विकास करने वाला तत्व है। यह व्यक्तियों को उनके दोष, पाप, और दुष्कृतियों से मुक्त कराकर उन्हें ऊँचाई पर ले जाता है। संस्कार केवल व्यक्तिगत विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के विकास में भी अहम भूमिका निभाता है। अज्ञान और अधर्म: समाज के लिए बाधा अज्ञान को अधर्म का पर्याय माना गया है। यह ...

मनुस्मृति का विरोध क्यों ?

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 मनुस्मृति का विरोध क्यों होना चाहिए ? वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्थ्य च प्रियमात्मनः एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥ (मनुः 2/12) श्रुति, स्मृति, सदाचार, और आत्मा को संतोष देना, यही चार मुख्य लक्षण हैं जो धर्म की पहचान के रूप में जाने जाते हैं। भारत में, इन चारों को धर्मानुकूल मार्ग का संकेतक माना गया है। भारत के बाहर भी, ये चार लक्षण धर्माचरण के प्रमाण रहे हैं, हालांकि मुसलमानों के लिए "कुरआन-हदीस" और ईसाइयों के लिए "तौरेत-इंजील" इसके स्थान पर प्रमाण हैं। सदाचार और आत्मतोष को सारा सभ्य संसार प्रमाण मानता है, लेकिन यह विभिन्न देशों के अनुसार भिन्न हो सकता है। भारत में जहां श्रुति-स्मृति के विरोध के उदाहरण हैं, जैसे चार्वाक के नास्तिक आचार्य, वहां जैनों की तरह अपनी-अपनी श्रुति और स्मृति का प्रमाण लिया गया है या केवल सदाचार और आत्मतोष को मान्यता दी गई है। कुछ लोग दार्शनिक दृष्टि से श्रुति-स्मृति का विरोध करते हैं, लेकिन समाज के आचरण और संगठन के संदर्भ में भारतीय प्रसिद्ध श्रुति-स्मृति का प्रमाण आज भी मान्य है। वर्णाश्रम धर्म समाज को संगठित रखने वाली एक सं...

हिंदुओं, धर्म समझ लो वरना बाद में बहुत पछताएंगे !

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हिंदुओं, धर्म समझ लो वरना बाद में बहुत पछताएंगे  धर्म का अर्थ और महत्व धर्म शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में पहली बार किया गया है, जहां विष्णु के तीन पदों का वर्णन है: " त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्॥ "। इसका अर्थ है कि धर्म का अर्थ धारण करना है, और यह वेदों के अर्थ को पोषित करता है। किसी वस्तु या जीव की विकासशील और धारणीय वृत्ति को उसका धर्म कहा जाता है। धर्म का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की वह धारा है जो समाज और व्यक्ति के विकास को सुनिश्चित करती है। धर्म के अभाव में वस्तु या जीव का नाश होता है, और धर्म की वृद्धि से उसका उत्थान होता है। धर्म और संस्कार का विज्ञान धर्म की परिभाषा को वैशेषिक दर्शन में "यतोऽभ्युदय-निःश्रेयस-सिद्धिः स धर्मः" के रूप में देखा गया है, जिसका अर्थ है कि धर्म वह है जिससे उन्नति और परम सुख की प्राप्ति होती है। कर्ममीमांसा शास्त्र में धर्म का लक्ष्य "धर्मानुकूल आचरण" को माना गया है, जो कि व्यक्ति के कर्तव्यों के अनुकूल होना चाहिए। धर्म और संस्कार का संबंध केवल आध्यात्मिक नह...

विश्वदृष्टि में हिंदु – डाकू, लुटेरा, चोर, दास या फिर कुछ ओर ?

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विश्वदृष्टि में हिंदु – डाकू, लुटेरा, चोर, दास या फिर कुछ ओर ? इस विषय की गम्भीरता को देखते हुए इसका विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर किया जाना उचित जान पड़ता है -  विश्व में आर्य संस्कृति और उसका प्रभाव आर्य संस्कृति का प्राचीन समय में इतना व्यापक और प्रबल प्रभाव था कि उसके पड़ोसी देश भी उसकी महानता को मानते थे। यह संस्कृति भारतीयों के प्रति आदर भाव उत्पन्न करने वाली थी , और इसने पूरे क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई। वेदव्यास और जरथुस्त्र का शास्त्रार्थ वेदव्यास और जरथुस्त्र के बीच हुए शास्त्रार्थ का उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि आर्य संस्कृति का प्रभाव केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक ही सीमित नहीं था , बल्कि यह ईरान तक भी पहुँच चुका था। वेदव्यास स्वयं ईरान गए थे , जो दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति के विद्वान अन्य संस्कृतियों के साथ संवाद स्थापित करने में सक्षम थे। "हिन्दू" शब्द की व्युत्पत्ति "सैंधव" से "हिन्दू" शब्द की व्युत्पत्ति यह सिद्ध करती है कि प्राचीन काल में "हिन्दू" का अर्थ नकारात्मक नहीं था। यह लोग न तो "डाकू ,...

हिन्दू कौन है ?

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हिन्दू कौन है ?      यह प्रश्न प्राचीन इतिहास , संस्कृति और भाषा के अध्ययन से जुड़ा है। "हिन्दू" शब्द का मूल और इसका अर्थ समझने के लिए हमें इसके ऐतिहासिक संदर्भों को देखना होगा। हिन्दू शब्द की उत्पत्ति और इतिहास प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में "हिन्दू" शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है। हालांकि , मेरुतंत्र नामक ग्रंथ में इसका जिक्र मिलता है। इस ग्रंथ में "हिन्दू" शब्द की व्युत्पत्ति और अर्थों पर चर्चा की गई है। फारसी कोषों में "हिन्द" शब्द का उपयोग भारतवर्ष के लिए होता था। "हिन्द" शब्द से कई अन्य शब्द जैसे हिन्दी , हिन्दसा , हिन्दू बनते हैं , जो इस देश के लिए फारसी भाषा में प्रयुक्त होते थे। भारतवर्ष के पश्चिम में स्थित देशों , विशेष रूप से ईरान के साथ , घनिष्ठ सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंध थे। "हिन्द" शब्द का उपयोग प्रथम भारतीयों के लिए किया जाता था जो पश्चिम की ओर यात्रा करते थे। यह शब्द समय के साथ "हिंदु" और फिर "हिन्दू" बन गया। पारसी साहित्य में हिन्दू पारसी साहित्य में "हप्त हेन्दु" या "स...