वैदिक एवं लौकिक साहित्य का परिचय एवं उद्देश्य
वैदिक एवं लौकिक साहित्य का परिचय एवं उद्देश्य
वैदिक साहित्य का परिचय
वैदिक साहित्य – भारत के पश्चिमोत्तर भाग में स्थित सप्तसिन्धु प्रदेश[1]
के निवासियों की साहित्यिक अभिव्यक्ति मौखिक रूप से जिस भाषा में हुई उसे वैदिक
संस्कृत कहते हैं। इस भाषा में बहुमूल्य साहित्यिक परम्परा चली जो धार्मिक एवं
लौकिक विषयों से भी भरी थी। वैदिक साहित्य तात्कालिक समाज की प्रवृत्तियों को
समझने में बहुत उपादेय है। वैदिक साहित्य के धार्मिक विषयों में यज्ञ, देवता, उनके स्वभाव,
भेद आदि आते हैं, तो लौकिक विषयों में मानव की
इच्छाएँ, संकट और उनके निवारण, समाज का
स्वरूप, चिकित्सा, दान, विवाह आदि हैं। इनसे समाज के विविध पक्षों का बोध होता है। वैदिक साहित्य
के विकास का समय 6000 ई. पू. से 800 ई. पू. तक माना जाता है। इस कालावधि में चार
चरणों में साहित्य का विकास देखा जाता है –
- संहिता
- ब्रह्मण
- आरण्यक
- उपनिषद्
1. संहिता – संहिताओं में वैदिक मन्त्रों का संग्रह है। इनके चार
मुख्य रूप हैं –
1) ऋग्वेदसंहिता
2) यजुर्वेदसंहिता
3) सामवेदसंहिता
4) अथर्ववेदसंहिता
इनका विभाजन वैदिक यज्ञों में काम करने वाले चार ऋत्विजों (यज्ञ कराने वालें) के कार्यों को ध्यान में रखकर हुआ था। यज्ञों में ये चार ऋत्विज होते हैं –
- होता
- अध्वर्यु
- उद्गाता
- ब्रह्मा
होता देवताओं को यज्ञ में बुलाता है और ऋचाओं का पाठ करते हुए यज्ञ-देवों की स्तुति करता है। होता के प्रयोग के लिए उपयोगी मन्त्रों का संग्रह ऋग्वेदसंहिता में है। अध्वर्यु का काम यज्ञ का विधिपूर्वक सम्पादन है। इसके लिए आवश्यक मन्त्र यजुर्वेदसंहिता में संकलित हैं। उद्गाता का काम यज्ञ में ऋचाओं का सस्वर गान करना है। वह मधुर स्वर में देवताओं को प्रसन्न करता है। उसके उपयोग के लिए ऋग्वेदसंहिता के मंत्र सामवेदसंहिता में संकलित किए गए हैं। ब्रह्मा नामक ऋत्विज् यज्ञ का पूरा निरीक्षण करता है, जिससे कोई त्रुटि न हो। यद्यपि वह सभी वेदों का ज्ञाता होता है, किन्तु उसका अपना विशिष्ट वेद अथर्ववेद-संहिता है। इन संहिताओं का अध्ययन विभिन्न परिवारों में पृथक् पृथक् रूप से होता है, परिणामस्वरूप इनकी अनेक शाखाएँ हैं। आज वैदिक संहिताओं की कुछ ही शाखाएँ उपलब्ध हैं।
2. ब्राह्मण – ब्राह्मण-ग्रन्थों का मुख्य उद्देश्य संहिताओं के मंत्रों
द्वारा यज्ञों की व्याख्या करना है। इस प्रसंग में बहुत-सी नैतिक, सामाजिक तथा राजनीतिक बातें भी आई हैं।
वैदिक धर्म का सांगोपांग विवेचन इन ग्रन्थों में किया गया है। वैदिक संहिताओं की
प्रत्येक शाखा की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण-ग्रन्थ पृथक् पृथक् हैं।
3. आरण्यक – ब्राह्मण-ग्रन्थों से सम्बद्ध आरण्यकों की रचना वनों
में हुई। वैदिक कर्मकाण्ड, अनुष्ठान
की उत्पत्ति और उसके महत्त्व के विषय में ऋषियों का जो चिन्तन हुआ, उसे आरण्यकों में रखा गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों के समान ये भी सरल गद्य में
ही लिखे गए। विभिन्न वैदिक संहिताओं की शाखाओं के आरण्यक भी पृथक्-पृथक् है।
कर्मकाण्डी जनसमुदाय को ज्ञानकाण्ड की ओर लगाने का प्रयास इन आरण्यकों में हुआ है।
इनका सम्बन्ध वानप्रस्थ आश्रम से है।
4. उपनिषद् – वैदिक साहित्य के विकास के अन्तिम चरण में
उपनिषद्-ग्रन्थ आते हैं। इनमें दर्शन-शास्त्र की विवेचना हुई, यद्यपि यह शास्त्र यत्र-तत्र पहले भी
संहिताओं और आरण्यकों में आता है। उपनिषदों में गुरु-शिष्य के संवादों के रूप में
बहुत गूढ़ बातें कही गई हैं। आत्मा, ब्रह्म तथा संसार के
रहस्यों को इन विवेचनाओं में प्रकाशित किया गया है। वैदिक साहित्य के अन्तिम भाग
में होने तथा वैदिक दर्शन के विकसित रूप को प्रकाशित करने के कारण इन्हें वेदान्त
भी कहा जाता है।
मूल वैदिक साहित्य को समझाने और उनका उपयोग बताने के लिए
वेदाङ्ग ग्रन्थ बने। वेदांगों की संख्या छः हैं जो कि निम्नलिखित हैं –
1) शिक्षा (उच्चारण की विधि)
2) कल्प (कर्मकाण्ड तथा आचार)
3) छन्द (अक्षरों की गणना के आधार पर पद्यात्मक मन्त्रों के
स्वरूप का निर्धारण तथा नामकरण)
4) निरुक्त (वैदिक शब्दों का निर्वचन या व्याख्या)
5) व्याकरण (शब्दों की व्युत्पत्ति)
6) ज्योतिष (यज्ञ के समय का निरूपण)।
इन्हें उपयोगिता की दृष्टि से वैदिक साहित्य में ही रखा
जाता है, यद्यपि इन विषयों से
सम्बद्ध ग्रन्थ लौकिक संस्कृत भाषा में लिखे गए। वेदांग प्रायः सूत्रात्मक हैं और
वैदिक कर्मकाण्ड की विपुलता को संक्षिप्त वाक्यों में प्रकाशित करते हैं। मुख्य
रूप से कर्मकाण्ड से सम्बद्ध कल्प-ग्रन्थों को सूत्र-साहित्य में रखा जाता है। इनके
मुख्य चार भेद हैं –
1) श्रौतसूत्र (वैदिक यज्ञों की प्रक्रिया बतलाने वाले)
2) गृह्य-सूत्र (व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन से सम्बद्ध कर्मकाण्ड का
वर्णन करने वाले)
3) धर्मसूत्र (धार्मिक एवं सामाजिक नियमों, कर्त्तव्यों और अधिकारों का वर्णन करने
वाले)
4) शुल्व-सूत्र (यज्ञवेदिका को नापने और उसके निर्माण का वर्णन करने
वाले)।
वैदिक साहित्य के प्रमुख ग्रन्थों का परिचय
1. ऋग्वेद – ऋग्वेद विश्व का प्रथम व्यवस्थित उपलब्ध ग्रन्थ है।
सप्तसिन्धु प्रदेश में रहने वाले आर्यों ने जो अपने धार्मिक विचार तथा दार्शनिक
भावनाएँ काव्य-रूप में व्यक्त की थीं,
उन्हीं का संग्रह ऋग्वेद संहिता है। ऋग्वेद के समय में जो
सांस्कृतिक चेतना थी, वही आज भी भारतीय मानस में वर्तमान है।
इससे संस्कृत की धारा के निरन्तर प्रवाह की पुष्टि होती है। ऋग्वेद के रचनाकाल को
लेकर अनेक मत प्रचलित हैं। परम्परागत भारतीय मत है कि वेद अपौरुषेय हैं अर्थात्
किसी पुरुष या व्यक्ति विशेष ने इनकी रचना नहीं की। वैदिक संहिताओं में संकलित
मन्त्रों के साथ मन्त्र-द्रष्टा ऋषि, देवता तथा छन्द का
उल्लेख भी प्राप्त होता है। आधुनिक विद्वान् इससे सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार इनकी
भी रचना उसी प्रकार हुई, जिस प्रकार संस्कृत के अन्य
ग्रन्थों की। अपने इसी मत के आधार पर उन्होंने ऋग्वेद के काल-निर्णय का प्रयास
किया। काल के विषय में वे स्वयं भी एकमत नहीं हैं। अलग-अलग विद्वानों ने इसका काल
अलग-अलग माना है। 6000 ई. पू. से लेकर 800 ई. पू. तक इसका समय माना गया है।
अधिसंख्य विद्वानों के अनुसार इसकी रचना 2000 ई. पू. के आसपास हुई। कतिपय
पाश्चात्त्य विद्वानों के मतानुसार सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोगों के साथ
ऋग्वेदीय आर्यों का युद्ध होता रहता था। आर्यों के शत्रुओं के रूप में ऋग्वेद में
पणि, दास तथा अरि का उल्लेख मिलता है। उनके मतानुसार इससे
ऋग्वेद की रचना के काल पर प्रकाश पड़ता है।
ऋग्वेद में अपने समय के बिखरे हुए मन्त्रों का संग्रह है, जो विभिन्न ऋषि परिवारों में प्रचलित थे
और जिनकी परम्परा उन ऋषि परिवारों में चली आ रही थी। ऋग्वेद को इसी संग्रह के कारण
संहिता कहा गया है। इसमें ऋचाओं का संकलन है। पूरा ऋग्वेद 10 मण्डलों में विभक्त
है। प्रत्येक मण्डल में अनेक सूक्त हैं। सम्पूर्ण ऋग्वेद में 1028 सूक्त हैं। कई
ऋचाओं के संग्रह को सूक्त कहते हैं, जो किसी विशेष देवता या
विषयवस्तु से सम्बद्ध होते हैं। मण्डलों का विभाजन ऋषियों के परिवारों के आधार पर
हुआ है। कई मण्डलों में किसी एक ही ऋषि द्वारा या उसके परिवार में पठित ऋचाओं का
ही संग्रह है। कई मन्त्रों की उद्भावना ऋषिकाओं ने भी की है, जैसे - लोपामुद्रा, अपाला, रोमशा
आदि। ऋचाओं की कुल संख्या 10580 है।
इस वेद के प्रथम तथा दशम मण्डल का आकार अपेक्षाकृत बड़ा है। इनमें अनेक
वंशों के ऋषियों की रचनाएँ हैं। इन मण्डलों को विषयवस्तु तथा भाषा के आधार पर बाद की
रचना माना गया है। इन्हीं मण्डलों में आर्यों के दार्शनिक और लौकिक विचार व्यक्त
हुए हैं। अन्य मण्डल प्राचीनतर हैं। नवम मण्डल में सोम से सम्बद्ध मन्त्रों को
एकत्र किया गया है। शेष मण्डलों में एक-एक गोत्र या वंश के ऋषियों की रचनाएँ हैं, इसलिए इनको वंश-मण्डल भी कहा जाता है।
सप्तम मण्डल की ऋचाएँ सबसे पुरानी मानी जाती हैं।
यद्यपि ऋग्वेद की इक्कीस शाखाएँ थीं,
किन्तु आज केवल शाकल, आश्वलायन एवं शांखायन
शाखा ही मिलती हैं। ऋग्वेद में आर्यों की एक लंबी बौद्धिक परम्परा प्राप्त होती है।
इस परम्परा में धार्मिक, सामाजिक और दार्शनिक विषयों का भी
निरूपण हुआ है। भारत की प्राचीनतम संस्कृति के विकास के ज्ञान के लिए ऋग्वेद का
अनुशीलन अपेक्षित है। धार्मिक दृष्टि से रचित त सूक्तों की संख्या इस संहिता में
अवश्य ही सर्वाधिक है। ऋग्वेद के सूक्तों में प्रमुख रूप से इन्द्र और अग्नि देवता
की प्रार्थना है। अन्य देवताओं में सविता, रुद्र, मित्र, वरुण, सूर्य, मरुत् आदि के अतिरिक्त उषा देवी भी हैं। यही नहीं, मन्यु
(क्रोध) के रूप में अमूर्त देवता की भी प्रार्थना की गई है।
इन देवताओं में नियामक तत्त्व के रूप में ऋग्वेद के ऋषियों ने ईश्वर को जगत्
का नियन्ता बताया है, जिसे
उन्होंने पुरुष एवं हिरण्यगर्भ भी कहा है। हिरण्यगर्भ सूक्त में कहा गया है कि
संसार के आरम्भ में हिरण्यगर्भ ही उत्पन्न हुआ, जो समस्त
चराचर का स्वामी था और इसी ने स्वर्ग, पृथ्वी सभी को धारण
किया। विशाल पर्वत और गंभीर सागर उस हिरण्यगर्भ-रूप परमात्मा (प्रजापति) के
अनुशासन में ही अवस्थित हैं।
ऋग्वेद संहिता में लौकिक विषयों पर भी ऋषियों की दृष्टि पड़ी है। इसमें
द्यूत-क्रीड़ा के दोष, मण्डूकों
की ध्वनि, विवाह की विधि, दान की महिमा
इत्यादि विषयों का भी उल्लेख है। इससे प्रतीत होता है कि ऋषियों ने धर्म और दर्शन
की विवेचना में तल्लीन होकर लौकिक विषयों की उपेक्षा नहीं की थी। उषा के सूक्तों
में वैदिक ऋषियों की ललित भावना भी दृष्टिगत होती है। ये सूक्त परवर्ती गीतिकाव्य
के स्रोत समझे जाते हैं।
पुरुष-सूक्त में सृष्टि की प्रक्रिया का प्रतिपादन है, तो नासदीय सूक्त में सृष्टि की रहस्यमयता
का भी संकेत है। सृष्टि से पहले न सत् था, न असत्। न ही उस
समय मृत्यु थी, न अमरता। उस समय अन्धकार ही सर्वत्र वर्तमान
था। इस प्रकार ऋग्वेद में गूढ़ दार्शनिक विचारों को भी महत्त्व दिया गया था।
ऋग्वेद में बहुत से संवाद-सूक्त भी हैं, जिन्हें कुछ लोग
नाटकों का प्रारम्भिक रूप भी कहते हैं। इन सूक्तों में पुरुरवा-उर्वशी तथा यम-यमी
के संवाद सामान्य लोकजीवन के भावों को व्यक्त करते हैं। इन संवादों में प्रेम,
हास्य, करुणा एवं वीरता जैसे मानवीय भावों का
भी चित्रण हुआ है।
ऋग्वेद के अनुशीलन से तात्कालिक आर्यों और दासों के जीवन के विषय में
पर्याप्त जानकारी मिलती है। यहीं दोनों के परस्पर संघर्ष का वर्णन मिलता है। आर्य
जहाँ दानी, उदार और
धर्मनिष्ठ थे, वहाँ दास लोग कृपण, अनुदार
तथा नास्तिक थे। वे विभिन्न प्रथाओं को मानते थे। ऋग्वेद सप्तसिन्धु प्रदेश की
तात्कालिक सभ्यता और संस्कृति का चित्र प्रस्तुत करने वाला अद्वितीय ग्रन्थ है।
2. यजुर्वेद - प्राचीन काल में यजुर्वेद की कुल 101 शाखाएँ थीं। इसके
दो रूप हैं - कृष्णयजुर्वेद तथा शुक्लयजुर्वेद। कृष्णयजुर्वेद की सर्वाधिक
प्रसिद्ध शाखा तैत्तिरीय संहिता और शुक्ल यजुर्वेद की प्रसिद्ध शाखा वाजसनेयी
संहिता है। कुछ लोग इसे ही मौलिक यजुर्वेद कहते हैं। इसमें केवल मन्त्रों का
संग्रह है, जबकि
कृष्णयजुर्वेद की संहिता में ब्राह्मण ग्रन्थ के विषय भी मिश्रित हैं।
कृष्णयजुर्वेद की अन्य संहिताएँ हैं - मैत्रायणी, काठक,
कपिष्ठल इत्यादि। इनका प्रचार दक्षिण भारत में अधिक है।
यजुर्वेद अनुष्ठान-विषयक संहिता है। यज्ञ में अध्वर्यु के द्वारा प्रयुक्त
मन्त्रों का इसमें संग्रह है। कृष्णयजुर्वेद में इन मन्त्रों के विषय में चर्चाएँ
भी हैं, किन्तु शुक्लयजुर्वेद
इन चर्चाओं से शून्य है। शुक्लयजुर्वेद में 40 अध्याय हैं, जिनमें
विविध यज्ञों से सम्बद्ध मन्त्र संकलित हैं। इन यज्ञों में दर्शपूर्णमास, अग्निहोत्र, चातुर्मास, सोमयाग,
वाजपेय, राजसूय, सौत्रामणि,
अश्वमेध आदि प्रमुख हैं। इसके सोलहवें अध्याय को रुद्राध्याय कहते
हैं, जिसमें रुद्र के विविध रूपों को नमस्कार किया गया है।
चौंतीसवें अध्याय में शिवसंकल्प की प्रार्थना है। पैंतीसवें अध्याय में पितरों की
प्रार्थना की गई है। अन्तिम अध्याय दार्शनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें ईश्वर को संसार का नियामक कहा गया है। यही अध्याय कुछ
परिवर्तनों के साथ ईशावास्योपनिषद् के रूप में आया है। यजुर्वेद में बहुत सुन्दर प्रार्थना-मन्त्र
हैं, जैसे –
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि
विद्वान्।
अर्थात्, हे अग्निदेव ! धन प्राप्ति के लिए आप
हमें सन्मार्ग पर ले चलें। हे देव, आप हमारे (अच्छे-बुरे)
सभी कार्यों को जानते हैं।
यजुर्वेद में कुछ मन्त्र पद्यात्मक और कुछ गद्यात्मक हैं। कर्मकाण्ड में
उपयोगी होने के कारण यजुर्वेद अन्य सभी वेदों की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय है। वेदों
के अधिकांश भाष्यकार यजुर्वेद पर व्याख्या लिखना अपना पहला कर्त्तव्य समझते हैं।
3. सामवेद – प्राचीन ग्रन्थों की सूचना के आधार पर सामवेद की 1000
शाखाएँ थीं, किन्तु आज
तीन-चार शाखाएँ ही उपलब्ध हैं। इनमें कौथुम शाखा अधिक लोकप्रिय है। सामवेद के
मन्त्रों का प्रयोग यज्ञ में देवताओं के आह्वान के लिए उचित स्वर के साथ उद्गाता
द्वारा किया जाता था। इसलिए साम-मन्त्रों का पाठ नहीं, अपितु
गान होता है। सामवेद छन्दोबद्ध है तथा 75 मन्त्रों को छोड़कर शेष मन्त्र ऋग्वेद
में भी उपलब्ध होते हैं। सामवेद के मन्त्रों के गान में लय तथा स्वर का विशेष
विधान है।
सामवेद संहिता के दो भाग हैं - पूर्वार्चिक तथा उत्तरार्चिक। पूर्वार्चिक
में आग्नेय, ऐन्द्र,
पवमान तथा आरण्य-पर्व के रूप में मन्त्रों का विभाजन है। वस्तुतः इन
देवताओं से सम्बद्ध मन्त्रों को पृथक् पृथक् रखा गया है। उत्तरार्चिक को दशरात्र,
संवत्सर, एकाह आदि विषयों के अनुसार व्यवस्थित
किया गया है। सामवेद में ग्रामगेय (स्वर-विशेष) गानों की संख्या सर्वाधिक है।
आरण्यगान में संकटपूर्ण और वर्जित रागों को संकलित किया जाता था। इसलिए ये ग्रामों
में नहीं गाए जाते थे। इन दोनों से सम्बद्ध क्रमशः ऊहगान और ऊह्यगान हैं, जो यज्ञकार्यों में साम-मन्त्रों को क्रमबद्धता प्रदान करते हैं। इस
प्रकार इसमें ये चार महत्त्वपूर्ण गान हैं- ग्राम, आरण्य,
ऊह तथा ऊह्य।
सामवेद का महत्त्व संगीत की दृष्टि से बहुत अधिक है। इससे भारतीय संगीत का
उद्भव हुआ। सामवेद के रागों का विकास धार्मिक तथा सांस्कृतिक दोनों प्रकार के
गीतों से हुआ। सामगान की अनेक विधियों में (जो सामवेद के ब्राह्मण-ग्रन्थों में
विहित हैं) अब कुछ ही शेष हैं।
4. अथर्ववेद – अथर्ववेद में यज्ञ से भिन्न विषयों का विपुल संकलन है।
बहुत दिनों तक कर्मकाण्ड से इसे पृथक् रखा गया था। त्रयी का अर्थ तीन वेद होता है, जिसमें अथर्ववेद का समावेश नहीं होता।
किन्तु वैदिक परम्परा में ही उसे ब्रह्मवेद कहा गया है अर्थात् वह ब्रह्मा नामक
ऋत्विज्ञ के उपयोग के लिए है। वस्तुतः अथर्ववेद को अथर्वाङ्गिरस वेद कहा जाता था।
अर्थात् इसके दो ऋषि थे - अथर्वा और अङ्गिरा।
इस वेद का विभाजन 20 काण्डों में किया गया है, जिनमें सूक्त और मन्त्र हैं। सूक्तों की संख्या 731 तथा
मन्त्रों की 5849 है। इनमें से लगभग 1200 मन्त्र ऋग्वेद संहिता से लिए गए हैं। इस
वेद का षष्ठांश गद्य में है। काण्डों के विभाजन में कोई विषय-व्यवस्था नहीं है,
किन्तु एक सूक्त में किसी एक ही विषय से सम्बद्ध मन्त्र हैं।
आरम्भिक काण्डों का संकलन व्यवस्था विशेष के अन्तर्गत है, क्योंकि
प्रथम काण्ड में चार मन्त्रों वाले, द्वितीय काण्ड में पाँच
मन्त्रों वाले, तृतीय में छः मन्त्रों वाले, चतुर्थ काण्ड में सात मन्त्रों वाले और पंचम काण्ड में आठ या अधिक
मन्त्रों वाले सूक्त रखे गए हैं। छठे काण्ड के 142 सूक्तों में सभी तीन मन्त्र
वाले हैं। इसी प्रकार सातवें काण्ड के 118 सूक्तों में एक-दो मन्त्रों वाले सूक्त
हैं। पन्द्रहवाँ एवं सोलहवाँ काण्ड गद्य में है। ये भाषा-शैली की दृष्टि से
ब्राह्मण-ग्रन्थों के समान लगते हैं।
अथर्ववेद में ही सर्वप्रथम लौकिक विषयों को व्यापक महत्त्व दिया गया है।
इसलिए इसकी विषयवस्तु में बहुत विविधता मिलती है। जीवन के प्रायः सभी पक्षों का
स्पर्श इसमें हुआ है, किन्तु
विशेष रूप से तात्कालीन विश्वासों का प्रकाशन इसमें अधिक है। इसी क्रम में अभिचार
(मारण, मोहन, उच्चाटन आदि) से सम्बद्ध
क्रियाओं का निरूपण है। अध्यात्म-विद्या, शत्रुनाश, आरोग्य-प्राप्ति, गृह-सुख, कृषि
में वृद्धि, भूत-प्रेतों का निवारण, कीट-पतंगों
का नाश, इष्ट वस्तु का लाभ, विवाह,
वाणिज्य, पितरों की पूजा आदि का विवेचन
अथर्ववेद के मन्त्रों में है। विविध रोगों का स्वरूप बतलाकर उनके निवारण की व्यापक
विधि इसमें दी गई है। कहीं सर्प-विष के नाश की प्रार्थना है, तो कहीं रोगों के निवारण के लिए शमीवृक्ष से प्रार्थना की गई है। कहीं
जीविका-प्राप्ति के लिए प्रार्थना है। ब्रह्मचर्य की महत्ता बतलाने के साथ-साथ
सौमनस्य के लिए प्रार्थना भी की गई है "मैं तुम्हारे मन को सौहार्द तथा
सौमनस्य से युक्त करता हूँ। सभी लोग परस्पर प्रेम रखें, जैसे
- गाय अपने बछड़े से रखती है। पुत्र पिता का अनुगामी हो, माता
वात्सल्यमयी हो, पत्नी पति से मधुर वाणी का व्यवहार करे।
भाई-भाई से द्वेष न करे, न बहन-बहन से द्वेष रखे, सभी अच्छे संकल्प लेकर कल्याण युक्त वाणी बोलें।" अथर्ववेद के बारहवें
काण्ड में भूमिसूक्त है, जिसमें पृथ्वी की महत्ता का
प्रतिपादन है। इसी में कहा गया है - माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः
अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है, मैं उसका पुत्र हूँ।
अथर्ववेद
में दार्शनिक सूक्त भी आए हैं, जो ब्रह्म, तप और असत् के विषय में विचार करते हैं।
ये विचार बाद में उपनिषदों में विकसित हुए। सामान्य वैदिक धर्म की मुख्य धारा से
पृथक् विशुद्ध लोक-प्रचलित विश्वासों का प्रतिपादक होने के कारण अथर्ववेद का वैदिक
साहित्य में स्वतन्त्र महत्त्व है।
ब्राह्मण ग्रन्थ
भारतीय परंपरा मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद कहती है
(मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्), किन्तु, आधुनिक विचारक वेद से केवल संहिता-भाग का ही
ग्रहण करते हैं। ब्राह्मण शब्द ब्रह्मन् से बना है, जिसका
अर्थ है- वेद (ब्रह्म) से सम्बद्ध। अतः वेदों की शाखाओं की व्याख्या करने के लिए
पृथक् पृथक् ब्राह्मण ग्रन्थ लिखे गए। यद्यपि इनका स्वरूप मूलतः धार्मिक है,
पर राजनीतिक, सामाजिक तथा दार्शनिक विषयों का
भी इनमें समावेश है। ये सभी विषय मन्त्रों की व्याख्या से ही जोड़े गए हैं। वैदिक
कर्मकाण्ड का विकास इन्हीं ग्रन्थों से जाना जा सकता है। इनके अतिरिक्त सृष्टि से
सम्बद्ध पौराणिक कथाएँ भी ब्राह्मणों में आई हैं। वस्तुतः वैदिक संहिताओं के
प्रतीकात्मक अर्थों को ब्राह्मणों में विस्तार दिया गया है। इनमें मत्स्य द्वारा
सृष्टि की रक्षा, शुनः शेप की बलि दिए जाने से रक्षा इत्यादि
कथाएँ हैं। यहाँ प्रत्येक याज्ञिक विधान से कोई न कोई आख्यान जोड़ दिया गया है।
ऋग्वेद-संहिता से सम्बद्ध दो ब्राह्मण-ग्रन्थ हैं - ऐतरेय
और कौषीतकि। पहले में 40 और दूसरे में 30 अध्याय हैं। दोनों में विषयवस्तु की बहुत
समानता है। इनमें सोमयाग, अग्निहोत्र,
राजसूय, राज्याभिषेक इत्यादि का विवरण दिया
गया है। ऐतरेय ब्राह्मण ऐतरेय महीदास की रचना है, जबकि कहोड़
कौषीतकि ने कौषीतकि ब्राह्मण की रचना की। इन दोनों में सरल गद्य का प्रयोग है।
शुक्लयजुर्वेद की माध्यन्दिन और काण्व दोनों शाखाओं के
ब्राह्मण ग्रन्थों का नाम शतपथ है,
किन्तु दोनों शाखाओं के शतपथ ब्राह्मण पृथक् पृथक् हैं। इनमें
अध्यायों की योजना में अन्तर है। माध्यन्दिन शतपथ में 14 काण्ड तथा 100 अध्याय हैं,
जबकि काण्व शाखा के शतपथ में 104 अध्याय तथा 17 काण्ड हैं। शतपथ
ब्राह्मण ऋग्वेद के बाद वैदिक साहित्य में सबसे बड़ा ग्रन्थ है। इसमें
दर्शपूर्णमास, पितृयज्ञ (श्राद्ध), उपनयन,
स्वाध्याय, अश्वमेध, सर्वमेध
इत्यादि का वर्णन है। पूरे ब्राह्मण-ग्रन्थ में याज्ञवल्क्य को प्रामाणिक माना गया
है, क्योंकि इसी ऋषि ने सूर्य की उपासना करके शुक्लयजुर्वेद
की प्राप्ति की थी। अग्नि-चयन वाले अध्याय में शाण्डिल्य ऋषि को प्रामाणिक माना
गया है। बृहदारण्यक उपनिषद् इसी ब्राह्मण का अन्तिम भाग है। कृष्णयजुर्वेद से
सम्बद्ध तैत्तिरीय ब्राह्मण है, जो वास्तव में तैत्तिरीय
संहिता का ही परिशिष्ट है। संहिता में कुछ अनुक्त विषय रह गए थे जिनकी पूर्ति इस
ब्राह्मण में हुई है। इस वेद की अन्य संहिताओं (काठक, मैत्रायणी
आदि) में तो ब्राह्मण ग्रन्थ अंग रूप से ही मिले हुए हैं। तैत्तिरीय ब्राह्मण में
तीन अष्टक या काण्ड हैं, जिनमें अग्न्याधान, गवामयन, सौत्रामणि इत्यादि यज्ञों का वर्णन है।
सामवेद से सम्बद्ध कई ब्राह्मण हैं, जैसे- ताण्ड्य (पञ्चविंश), षड्विंश, जैमिनीय इत्यादि। ताण्ड्य ब्राह्मण में
प्राचीन दन्तकथाओं के साथ व्रात्यों (आर्य जाति से बहिष्कृत वर्ग) के पुनः
वर्णप्रवेश का वर्णन है। षड्विंश ब्राह्मण में चमत्कार और शकुन से सम्बद्ध अद्भुत
ब्राह्मण नामक एक अध्याय है। जैमिनीय ब्राह्मण में तीन भाग हैं तथा यह शतपथ के
समान महत्त्वपूर्ण है। इसमें विज्ञान की भी सामग्री मिलती है। इनके अतिरिक्त
सामवेद से सम्बद्ध दैवत, आर्षेय, सामविधान,
वंश, छान्दोग्य, संहितोपनिषद्
इत्यादि कई ब्राह्मण-ग्रन्थ हैं। अथर्ववेद से सम्बद्ध एक गोपथ ब्राह्मण मिलता है,
जिसमें दो भाग हैं- पूर्व गोपथ और उत्तर गोपथ। इसमें सृष्टि,
ब्रह्मा, ब्रह्मचर्य, गायत्री
आदि की महिमा का वर्णन है। इसमें ओंकार के साथ त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) का भी उल्लेख है। ब्राह्मण ग्रन्थों में सांस्कृतिक
तत्त्वों का बीज भी प्राप्त होता है, जैसे- सृष्टि की
व्याख्या, वर्णाश्रम-धर्म, स्त्री-महिमा,
अतिथि सत्कार, यज्ञ का महत्त्व, सदाचार, विद्यावंश इत्यादि।
आरण्यक
आरण्यकों की रचना वनों में हुई। वनों में रहकर चिन्तन
करने वाले ऋषियों ने वैदिक कर्मकाण्डवाद से पृथक् रहकर उनमें प्रतीक खोजने की
चेष्टा की। ब्राह्मणों के परिशिष्ट के रूप में विकसित आरण्यकों में यज्ञ के
अंतर्गत अध्यात्मवाद का पल्लवन किया गया। कर्म की यही व्याख्या आगे चलकर
मीमांसा-दर्शन, धर्मशास्त्र
तथा कर्मवाद में विकसित हुई। वानप्रस्थों के यज्ञों का विधान करने के साथ-साथ
उपनिषदों के ज्ञान-काण्ड की भूमिका भी आरण्यकों में तैयार की गई। प्राणविद्या का
विवेचन आरण्यकों का वैशिष्ट्य है।
इस समय सात आरण्यक ग्रन्थ उपलब्ध हैं। ऋग्वेद के
आरण्यकऐतरेय और कौषीतकि, ये
दोनों इन्हीं नामों वाले ब्राह्मण-ग्रन्थों के अंग हैं। यजुर्वेद के बृहदारण्यक,
तैत्तिरीयारण्यक तथा मैत्रायणीयारण्यक नामक तीन आरण्यक हैं। सामवेद
के जैमिनीय और छान्दोग्य आरण्यक मिलते हैं। इन सभी में अपनी शाखाओं से सम्बद्ध
कर्मों का विचार किया गया है, साथ ही संन्यास-धर्म का भी
महत्त्व बतलाया गया है। बृहदारण्यक में कहा गया है कि इसे जानकर मनुष्य मुनि बन
जाता है। आत्मा को जानकर वह ब्रह्मलोक की कामना करते हुए परिव्राजक बनकर पुत्र,
वित्त और लोक की एषणा (इच्छा) का त्याग करता है तथा भिक्षाचर्या
करता है।
उपनिषद्
वैदिक साहित्य में प्रचार की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व
उपनिषदों का है। इनकी महत्ता दार्शनिक विचारों के कारण है, जिनसे ये देश-विदेश में लोकप्रिय हैं।
दाराशिकोह ने इनका अनुवाद फारसी में किया था। पुनः यूरोपीय भाषाओं में भी इनका
अनुवाद हुआ। फ्रांसीसी दार्शनिक शॉपेनहावर ने कहा था "उपनिषद् मेरे जीवन तथा
मृत्यु दोनों के लिए सान्त्वनादायक हैं।"
प्राचीन उपनिषदों की संख्या 13 थी[2], किन्तु कालान्तर में इनकी संख्या शताधिक
हो गई। परवर्ती उपनिषदों में विभिन्न मतावलम्बियों ने अपने धर्मों का सार प्रकट
किया, किन्तु इनका सम्बन्ध वैदिक साहित्य से स्थापित नहीं हो
सकता। वैदिक शाखाओं में मौलिक रूप से दार्शनिक चिन्तन के लिए विकसित उपनिषदों की
गणना इस प्रकार की जाती है –
ऋग्वेद से सम्बद्ध |
ऐतरेय तथा कौषीतकि। |
कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध |
कठ, श्वेताश्वतर, मैत्रायणी
(मैत्री) तथा तैत्तिरीय। |
शुक्लयजुर्वेद से सम्बद्ध |
ईश तथा बृहदारण्यक। |
सामवेद से सम्बद्ध |
छान्दोग्य तथा केन। |
अथर्ववेद से सम्बद्ध |
प्रश्न, मुण्डक तथा माण्डूक्य। |
उपनिषदों में प्रायः संवादों के द्वारा तत्त्वज्ञान
समझाया गया है। उनमें पुरुष के शरीर में प्राणादि की प्रतिष्ठा, आत्मा से सृष्टि की उत्पत्ति, विद्या और अविद्या का अन्तर, जगत् और आत्मा के
स्वरूप, ब्रह्मतत्त्व इत्यादि विषय बहुत रोचक शैली में समझाए
गए हैं। कहीं प्रश्नोत्तर के द्वारा, तो कहीं दृष्टान्तों के
द्वारा इन विषयों का निरूपण हुआ है। उपनिषदों में गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग
है। बृहदारण्यक तथा छान्दोग्य बड़े उपनिषद् हैं शेष लघु हैं। माण्डूक्योपनिषद् में
तो केवल 12 वाक्य हैं। ईशोपनिषद् में 18 मन्त्र हैं, जो
यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के रूप में हैं। कठोपनिषद् में यम-नचिकेता के संवाद
में आत्मा का स्वरूप बतलाया गया है। बृहदारण्यक में जनक-याज्ञवल्क्य के
शास्त्रार्थ से ब्रह्म का निरूपण है। इस उपनिषद् में याज्ञवल्क्य की विदुषी पत्नी
मैत्रेयी तथा उनसे शास्त्रार्थ करने वाली गार्गी की कथा आई है, जिससे उस युग की विदुषी स्त्रियों का पता लगता है।
उपनिषदों के आधार पर वेदान्त-दर्शन का विकास हुआ, जिसके फलस्वरूप ब्रह्मसूत्र की रचना
बादरायण ने की। महाभारत के भीष्मपर्व में अवस्थित गीता भी उपनिषदों के दर्शन को ही
पौराणिक शैली में प्रस्तुत करती है। उपनिषदों में परम सुख की प्राप्ति का मार्ग
समझाया गया है। ब्रह्म के लक्षण हैं- सत्, चित् और आनन्द। इन
तीनों की व्याख्या उपनिषदों में सम्यक् रूप से की गई है।
शंकराचार्य ने मुख्य 10 उपनिषदों पर भाष्य लिखकर
अद्वैतवाद का प्रवर्तन किया। इसी प्रकार वेदान्त के विभिन्न सम्प्रदायों में
उपनिषदों की अपने-अपने ढंग से व्याख्या की गई। उपनिषदों में दर्शन-शास्त्र के
अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं।
वेदाङ्ग
कालक्रम से वैदिक संस्कृत के स्थान पर लौकिक संस्कृत का
प्रचलन होने पर, वैदिक
मन्त्रों का उच्चारण करना तथा अर्थ समझना कठिन हो गया। यास्क ने कहा है कि वैदिक अर्थों
को समझने में कठिनाई का अनुभव करने वाले लोगों ने निरुक्त तथा अन्य वेदाङ्गों की
रचना की। वेदों के छः अंग माने गए- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष तथा
छन्द। इन्हें समझने वाला व्यक्ति ही वेदों का सही उच्चारण, अर्थबोध
एवं यज्ञ कार्य कर सकता था। इन सभी शास्त्रों के ग्रन्थ लौकिक संस्कृत में लिखे गए,
क्योंकि इनके विकास का कारण ही था वैदिक संस्कृत का प्रयोग समाप्त
हो जाना। इनका काल 800 ई. पू. से प्रारम्भ होता है।
1. शिक्षा – यह उच्चारण का विज्ञान है, जो स्वर-व्यञ्जन के उच्चारण का विधान
करता है। इसका विस्तार प्रातिशाख्य ग्रन्थों में मिलता है। वेदों की पृथक् पृथक्
शाखाओं का उच्चारण बतलाने के कारण इन्हें प्रातिशाख्य कहा जाता है। ऋक्प्रातिशाख्य
शौनक-रचित ग्रन्थ है, जो ऋग्वेद के अक्षरों, वर्णों एवं स्वरों की संधियों का विवेचन करता है। इसी प्रकार अन्य वेदों
के भी प्रातिशाख्य हैं, जो उन वेदों के उच्चारणों का
वैशिष्ट्य बतलाते हैं। ये सभी सूत्र रूप में हैं।
2. कल्प – यह मुख्यतः वैदिक कर्मकाण्ड का प्रतिपादन करने वाला
वेदाङ्ग है। कल्प का अर्थ है - विधान। यज्ञ-सम्बन्धी विधान कल्प सूत्रों में दिए गए हैं। कल्प के चार
भेद हैं, जिन्हें श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र,
धर्मसूत्र तथा शुल्वसूत्र कहते हैं। ये चारों विभिन्न वेदों के लिए
पृथक् पृथक् हैं। श्रौतसूत्रों में श्रौतयज्ञों का विधान है, जैसे- दर्शपूर्णमास, अग्निहोत्र, चातुर्मास्य, वाजपेय, अतिरात्र,
पितृमेध इत्यादि। इस समय आश्वलायन, शांखायन
(ऋग्वेद), कात्यायन (शुक्लयजुर्वेद), जैमिनीय
(सामवेद) वैतान (अथर्ववेद) इत्यादि श्रौतसूत्र उपलब्ध हैं। गृह्यसूत्र गृह्याग्नि
में होने वाले संस्कारों तथा गृह्ययागों का वर्णन करते हैं, जैसे
उपनयन, विवाह आदि। सभी वेदों से सम्बद्ध लगभग 20 गृह्यसूत्र
प्राप्त हैं। धर्मसूत्रों में मानव-धर्म, समाज-धर्म, राजधर्म तथा पुरुषार्थों का वर्णन है। इस समय छः धर्मसूत्र मिलते हैं-
गौतम, आपस्तम्ब, वसिष्ठ, बौधायन, हिरण्यकेशी और विष्णुधर्मसूत्र। ये
धर्मसूत्र ही परवर्ती स्मृतियों के आधार हैं। शुल्व का अर्थ है मापने का सूत
(धागा)। इन सूत्रों में यज्ञवेदिका के निर्माण आदि का वर्णन रेखागणित (ज्यामिति)
की सहायता से किया गया है।
3. व्याकरण – इसे वेदों का मुख कहा गया है। इस शास्त्र में प्रकृति
और प्रत्यय के रूप में विभाजन करके पदों की व्युत्पत्ति बतलाई जाती है। व्याकरण की
बहुत लम्बी परम्परा इन्द्र आदि वैयाकरणों से चली, किन्तु उस परम्परा के अवशेष यत्र-तत्र उद्धरणों में ही पाए
जाते हैं। प्रथम उपलब्ध व्याकरण ग्रन्थ के प्रणेता पाणिनि ही हैं, जिन्होंने अष्टाध्यायी के रूप में वैदिक और लौकिक संस्कृत दोनों भाषाओं का
व्याकरण लिखा है। व्याकरण से वेदों की रक्षा होती है तथा वही पदशुद्धि का विचार
करता है। सम्प्रति पाणिनि की अष्टाध्यायी ही व्याकरण का प्रतिनिधि-ग्रन्थ है,
जिस पर टीकाओं की समृद्ध परम्परा मिलती है।
4. निरुक्त – इसका अर्थ है निर्वचन। वैदिक शब्दों का अर्थ व्यवस्थित
रूप से समझाना ही निरुक्त का प्रयोजन है। इस समय यास्क-रचित निरुक्त ही एक मात्र
उपलब्ध निरुक्त है। वैदिक शब्दों का संग्रह निघण्टु (पाँच अध्याय) के रूप में
प्राप्त होता है। उसी की व्याख्या यास्क ने निरुक्त के 14 अध्यायों में की है।
यास्क का काल 800 ई. पू. माना जाता है। निरुक्त वेदार्थज्ञान की कुंजी है।
5. ज्योतिष – यह काल का निर्धारण करने वाला वेदाङ्ग है। वैदिक-यज्ञ
काल की अपेक्षा रखते हैं और वे किसी निश्चित काल में ही सम्पादित होते हैं, तभी उनका फल मिलता है। इसका निश्चय
ज्योतिष करता है। काल का विभाजन, मुहूर्त का निश्चय, ग्रहों-नक्षत्रों की गति का निर्धारण इत्यादि ज्योतिष के ही विषय हैं।
लगधाचार्य ने इन कार्यों के लिए वेदाङ्ग ज्योतिष नामक ग्रन्थ लिखा था। इसके दो
संस्करण हैं- आर्च ज्योतिष (ऋग्वेद से सम्बद्ध) जिसमें 36 श्लोक हैं तथा याजुष्
ज्योतिष (यजुर्वेद से सम्बद्ध), जिसमें 43 श्लोक हैं।
6. छन्द – यह पद्यबद्ध वेदमन्त्रों के सही-सही उच्चारण के लिए
उपयोगी वेदाङ्ग है। इससे वैदिक मन्त्रों के चरणों का ज्ञान होता है। इसका ज्ञान
वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के लिए आवश्यक है। इससे छन्दः शास्त्र का महत्त्व सिद्ध
होता है। वेदों में सात मुख्य छन्द प्रयुक्त हैं- गायत्री (आठ अक्षरों के तीन चरण), अनुष्टुप् (आठ अक्षरों के चार चरण),
त्रिष्टुप् (11 अक्षरों के चार चरण) बृहती, जगती,
पङ्क्ति, उष्णिक्। छन्द-शास्त्र
जानने से वैदिक मन्त्रों के चरणों की व्यवस्था समझी जा सकती है तथा मन्त्र-पाठ के
समय उचित विराम हो सकता है।
वेदों और वेदाङ्गों के सम्यक् ज्ञान के लिए कालान्तर में
कुछ परिशिष्ट ग्रन्थ भी लिखे गए। इन ग्रन्थों को अनुक्रमणी कहते हैं। इनमें देवता, ऋषि, छन्द, सूक्त इत्यादि की गणना हुई है। सभी वेदों की पृथक् पृथक् अनुक्रमणियाँ
हैं। ऋग्वेद की अनुक्रमणियाँ शौनक ने लिखीं। ऋग्वेद के देवताओं की अनुक्रमणी के
रूप में छन्दोबद्ध ग्रन्थ बृहद्देवता उपलब्ध है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।
इसमें आठ अध्याय तथा 1204 श्लोक हैं।
इसी प्रकार,
ऋक्सर्वानुक्रमणी, छन्दोऽनुक्रमणी, आर्षानुक्रमणी आदि परिशिष्ट ग्रन्थ हैं। यजुर्वेद के परिशिष्ट कात्यायन ने
रचे। अथर्ववेद के परिशिष्टों में सर्वानुक्रमणी महत्त्व रखती है। इसमें अथर्ववेद
के प्रत्येक काण्ड के देवताओं, ऋषियों, सूक्तों और मन्त्रों का विवरण है। ये परिशिष्ट वेदों की रक्षा करने में
महत्त्वपूर्ण योगदान करते रहे हैं। इन्हीं के कारण वेदों में एक अक्षर की भी
न्यूनता और वृद्धि नहीं हो सकी है। संस्कृत साहित्य के प्रथम चरण में विकसित वैदिक
वाङ्गमय की व्याख्याएँ परवर्ती युग में बहुत दिनों तक होती रहीं। व्याख्याओं के
संबंध में विभिन्न मत चलते रहे और विभिन्न भाषाओं में इनके अनुवाद भी होते रहे
हैं। आधुनिक युग में इन वैदिक ग्रन्थों के अच्छे-अच्छे संस्करण व्याख्याओं और
अनुवादों के साथ प्रकाशित हुए हैं।
लौकिक साहित्य का परिचय एवं उसका महत्त्व
रामायण,
महाभारत एवं स्मृति-ग्रन्थ
रामायण और महाभारत संस्कृत भाषा के ऐसे महान् ग्रन्थ हैं, जिन पर भारत की बहुत बड़ी साहित्यिक
सम्पदा आश्रित है। ये दोनों ग्रन्थ वैदिक और लौकिक साहित्य के सन्धि काल में लिखे
गए। इनसे संस्कृत साहित्य ही नहीं, अपितु भारतीय समाज भी
प्रभावित हुआ। सामान्य भारतीय जीवन पर भी रामायण और महाभारत का व्यापक प्रभाव पड़ा
है। भारतीय समाज के विषय में कोई भी अध्ययन इन महाग्रन्थों के अनुशीलन के बिना
अपूर्ण है। दोनों ग्रन्थों ने अनेक कवियों और नाटककारों को कथानक दिए हैं, इसलिए इन्हें उपजीव्य काव्य कहा जाता है।
दोनों ग्रन्थों का प्रभाव समान होने पर भी कई दृष्टियों
से ये परस्पर भिन्न हैं। रामायण को आदिकाव्य कहा जाता है, क्योंकि इसने वैदिक संस्कृत से भिन्न
लौकिक संस्कृत में काव्यधारा का प्रवर्तन किया। इसके रचयिता वाल्मीकि आदिकवि कहे
जाते हैं। दूसरी ओर महाभारत को इतिहास कहते हैं, जिसके
रचयिता व्यास हैं।
रामायण का सामान्य परिचय
रामायण के रचयिता वाल्मीकि ने प्रथम अलंकृत काव्य लिखकर
समस्त परवर्ती भारतीय कवियों के लिए आदर्श प्रस्तुत किया था (मधुमयभणितीनां
मार्गदर्शी महर्षिः)। कहा जाता है कि एक निषाद द्वारा क्रीडारत क्रौञ्च पक्षी के
मारे जाने की घटना देखकर, करुणा
से वाल्मीकि का हृदय द्रवित हो उठा और उनके मुख से स्वयं ही यह पद्य फूट पड़ा –
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्।।
महर्षि वाल्मीकि की वाणी अनुष्टुप् छन्द में फूटी थी जो
लौकिक संस्कृत भाषा का श्लोक था। उसी वाणी में उन्होंने आदर्श पुरुष राम की कथा
लिखी। रामायण में राम की कथा बहुत विस्तार से वर्णित है जहाँ-तहाँ आवश्यकता के
अनुसार इसमें कवि वाल्मीकि ने अवान्तर कथाएँ दी हैं एवं प्रकृति का भी व्यापक
वर्णन किया है। वाल्मीकि की दृष्टि इतनी सूक्ष्म है और कल्पना-शक्ति इतनी उर्वर है
कि एक-एक दृश्य को उन्होंने बहुत विस्तार प्रदान किया है।
रामायण का विभाजन सात काण्डों में हुआ है –
1. बालकाण्ड
2. अयोध्याकाण्ड
3. अरण्यकाण्ड
4. किष्किन्धाकाण्ड
5. सुन्दरकाण्ड
6. युद्धकाण्ड
7. उत्तरकाण्ड
प्रत्येक काण्ड को सर्गों में विभक्त किया गया है।
परवर्ती संस्कृत महाकवियों ने भी रामायण के इस आदर्श पर महाकाव्यों को सर्गों में
विभक्त किया है तथा महाकाव्य के लक्षणों को स्थापित किया। इसी आधार पर कालिदास, भारवि, माघ आदि ने
महाकाव्यों की रचना की। रामायण में 24,000 श्लोक हैं।
रामायण के अभी तीन संस्करण उपलब्ध हैं, जो भारत के विभिन्न क्षेत्रों में
प्रचलित हैं। तीनों संस्करणों की समीक्षा करके बड़ौदा से रामायण का विशिष्ट
संस्करण निकला है।
रामायण के रचनाकाल के विषय में विद्वानों ने बहुत विवेचन
किया है। महाभारत से पूर्व इसकी रचना हो चुकी थी, क्योंकि महाभारत में रामायण की पूरी कथा वर्णित है और राम
के जीवन से सम्बद्ध कुछ स्थलों को वहाँ तीर्थ के रूप में देखा गया है। रामायण का
संकेत जैन और बौद्ध ग्रन्थों से भी प्राप्त होता है। इस प्रकार रामायण रचना पाँचवी
शताब्दी ई. पू. में मानी जाती है।
रामायण का सांस्कृतिक मूल्य
रामायण का सांस्कृतिक महत्त्व बहुत अधिक है। वाल्मीकि ने
इस महाकाव्य के द्वारा जीवन के आदर्शभूत और शाश्वत मूल्यों का निर्देश किया है।
इसमें उन्होंने राजा, प्रजा,
पुत्र, माता, पत्नी,
पति, सेवक आदि संबंधों का एक आदर्श स्वरूप
प्रस्तुत किया है। राम का चरित्र एक आदर्श महापुरुष के रूप में है, जो सत्यवादी, दृढ़संकल्प वाले, परोपकारी, चरित्रवान्, विद्वान्,
शक्तिशाली, सुन्दर, प्रजापालक
तथा धीर पुरुष हैं। वाल्मीकि ने उनके गुणों को बहुत विस्तार से प्रकट किया है। इसी
प्रकार सीता के आदर्श तथा गौरवपूर्ण पत्नी-रूप को भी वाल्मीकि ने स्थापित किया है।
राम का भ्रातृप्रेम रामायण में अत्यंत सरल एवं भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया
गया है-
देशे देशे कलत्राणि देशे देशे च बान्धवाः।
तं तु देशं न पश्यामि यत्र भ्राता सहोदरः॥
किसी भी देश में पत्नी प्राप्त की जा सकती है तथा
बन्धुत्व कहीं भी स्थापित किया जा सकता है,
किन्तु सहोदर भाई कहीं नहीं प्राप्त हो सकता है।
राम का चरित्र इतना उदार और ऊँचा है कि वे रावण की मृत्यु
के बाद विभीषण को उसके शरीर-संस्कार का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं - विभीषण!
शत्रु की मृत्यु से वैर का अन्त हो जाता है। हमारी शत्रुता भी समाप्त हो गई। अब तो
रावण का शरीर मेरे लिए भी वैसा ही है,
जैसा तुम्हारे लिए –
मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्।
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव॥
भरत की राज्यपद के प्रति अनासक्ति,
लक्ष्मण की भ्रातृ-सेवा एवं हनुमान् की स्वामिभक्ति ये तीनों जीवन
के सर्वोच्च आदर्श रामायण में उपलब्ध होते हैं। काव्य का उद्देश्य है- मधुरभाव से
उपदेश देना। उसमें वाल्मीकि को पूरी तरह सफलता मिली है। प्रकृति-वर्णनों में कवि
वाल्मीकि तन्मय हो जाते हैं। उनकी उपमाएँ हृदय को आकृष्ट कर लेती हैं। अशोकवाटिका
में शोकमग्न सीता की तुलना कवि संदेह से भरी स्मृति, अधूरी
श्रद्धा, नष्ट हुई आशा, विघ्न से युक्त
सिद्धि, कलुषित बुद्धि तथा लोकनिन्दा के कारण नष्ट कीर्ति से
करते हैं। इससे कवि हमारे हृदय में करुणा की भावना जगाते हैं।
रामायण से संस्कृत कवियों को तथा समस्त भारतीय भाषाओं के
कवियों को भी राम-कथा लिखने की प्रेरणा मिली तथा विदेशों में भी रामायण का प्रभाव
स्थापित हुआ। पूरे एशिया महाद्वीप की सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा राम-कथा ही है।
महाभारत का सामान्य परिचय
महर्षि व्यास द्वारा रचित महाभारत संस्कृत वाङ्गय का सबसे
बड़ा ग्रन्थ है, जिसमें एक लाख
श्लोक हैं। इसीलिए इसे शतसाहस्री संहिता भी कहते हैं। महाभारत में मूलतः कौरवों और
पाण्डवों का संघर्ष वर्णित है, किन्तु प्रासंगिक रूप से
प्रतिपादित जीवन-विषयक प्राचीन भारतीय ज्ञान के सभी पक्षों का यह अद्भुत विश्वकोष
है। इसका शान्तिपर्व युगों से जीवन की समस्याओं का समाधान करता आ रहा है। इस
इतिहास ग्रन्थ को प्राचीन भारतीयों ने धर्म-ग्रन्थ की मान्यता दी है तथा इसे पंचम
वेद कहा है। दार्शनिक समस्याओं का समाधान करने वाला विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ
भगवद्गीता, महाभारत के भीष्मपर्व का एक अंश है। महाभारत अपनी
विशालता के अतिरिक्त संसार के सभी विषयों को समाविष्ट करने के कारण महत्त्वपूर्ण
है। इसके विषय में कहा गया है –
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों लक्ष्यों के विषय में
जो बातें इस ग्रन्थ में कही गई हैं, वे ही अन्यत्र मिलती हैं,
किंतु जो इसमें नहीं हैं, वे कहीं नहीं मिलती
हैं। इस उक्ति से महाभारत के विवेचनीय विषय की व्यापकता सिद्ध होती है।
रामायण के समान महाभारत भी संस्कृत कवियों के लिए कथानक
की दृष्टि से उपजीव्य ग्रन्थ रहा है। इसकी मुख्य कथा तथा उपाख्यानों के आधार पर
विभिन्न कालों में संस्कृत कवियों ने काव्य,
नाटक, चम्पू, कथा,
आख्यायिका आदि अनेक प्रकार की साहित्यिक सृष्टि की है। इण्डोनेशिया,
जावा, सुमात्रा आदि देशों के साहित्य पर भी
महाभारत का प्रभाव विद्यमान है। वहाँ के लोग भी महाभारत के पात्रों के अभिनय से
अपना मनोरंजन करने के साथ-साथ शिक्षा भी ग्रहण करते हैं।
महर्षि वेदव्यास का नाम कृष्णद्वैपायन भी है। महाभारत के
पात्रों से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध था। महाभारत के आदि-पर्व में कहा गया है कि
कृष्णद्वैपायन ने तीन वर्षों तक निरन्तर परिश्रम से महाभारत की रचना की थी। इतिहास
के आधुनिक विद्वानों का कहना है कि महाभारत को एक लाख श्लोकों का वर्तमान रूप अनेक
शताब्दियों के विकासक्रम में प्राप्त हुआ। व्यास ने प्राचीन काल की गाथाओं को
एकत्र करके इस ग्रन्थ की मूल रचना की थी। इसके विकास के तीन चरण हैं- जय, भारत और महाभारत। जय नामक ग्रन्थ में
8,800 श्लोक थे। इसमें पाण्डवों की विजय का वर्णन किया गया था। दूसरे चरण में भारत
नामक ग्रन्थ प्रस्तुत हुआ, जिसमें 24,000 श्लोक थे। इसमें
उपाख्यान नहीं थे। युद्ध का वर्णन ही प्रधान विषय था। इसी भारत को वैशम्पायन ने
पढ़कर जनमेजय को सुनाया था। इस ग्रन्थ में जब उपाख्यान आदि जोड़े गए तथा इसे
व्यापक विश्वकोश का स्वरूप दिया गया, तब इसका नाम महाभारत
पड़ा। यही महाभारत लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा द्वारा नैमिषारण्य में शौनकादि
ऋषियों को सुनाया गया था। ये उपाख्यान प्राचीन लोककथाओं के साहित्यिक संस्करण थे।
इस स्थिति से इसमें एक लाख श्लोक हो गए। यह भारतीय धर्म और संस्कृति का विशाल
भण्डार बन गया।
महाभारत के दो पाठ प्राप्त होते हैं- एक उत्तर भारत का, दूसरा दक्षिण भारत का। दोनों में
श्लोक-संख्या, अध्यायों का क्रम तथा आख्यानों के स्थान को
लेकर बहुत अन्तर है। महाभारत के विशुद्ध रूप को सुनिश्चित करने वाला एक संस्करण
पुणे से प्रकाशित हुआ है। महाभारत का विभाजन पर्वों में हुआ, जिनकी संख्या 18 है- आदि, सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री,
शान्ति, अनुशासन, आश्वमेधिक,
आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक
तथा स्वर्गारोहण। इन पर्वों का पुनः विभाजन अध्यायों में हुआ है। इनमें कौरवों तथा
पाण्डवों की उत्पत्ति से लेकर पाण्डवों के स्वर्ग जाने तक का वर्णन है। यही
महाभारत की मूल कथा है। इसमें बहुत से मार्मिक प्रसंगों का वर्णन किया गया है,
जैसे द्यूत-क्रीड़ा, द्रौपदी का अपमान,
विराट की राजसभा में पाण्डवों का छद्म रूप से रहना, कौरवों तथा पाण्डवों का युद्ध इत्यादि।
हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए कौरवों और पाण्डवों के
संघर्ष का इसमें वर्णन है। पाण्डवों ने कौरवों से आधा राज्य प्राप्त कर राजसूय
यज्ञ किया, किन्तु
ईर्ष्यालु कौरवों ने पाण्डवों को जुए में हराकर उन्हें शर्त के अनुसार तेरह वर्षों
के लिए वन जाने को विवश कर दिया। अन्तिम वर्ष में अज्ञातवास की यह शर्त रखी गई कि
यदि इस अवधि में पाण्डवों का पता चल गया, तो उन्हें पुनः
उतने ही वर्षों के लिए वनवास स्वीकार करना पड़ेगा। पाण्डव सफलतापूर्वक यह शर्त
पूरी करने पर अपना राज्य माँगते हैं, किन्तु उन्हें राज्य
नहीं दिया जाता। इसीलिए महाभारत का युद्ध होता है जो 18 दिनों तक चलता है। इसमें
कौरवों का सर्वनाश हो जाता है। उल्लेखानुसार संजय ने युद्ध का वर्णन नेत्रहीन
धृतराष्ट्र के लिए एक स्थान पर बैठे-बैठे किया था। युद्ध के आरम्भ में विषादग्रस्त
अर्जुन को युद्ध के लिए कृष्ण प्रेरित करते हैं और गीता का अमूल्य उपदेश देते हैं।
कर्म की प्रेरणा देने वाला भगवद्गीता नामक यह ग्रन्थ इतना महत्त्वपूर्ण है कि
प्राचीन काल से आधुनिक काल तक देश-विदेश के दार्शनिकों को प्रभावित करता रहा है।
महाभारत का रचनाकाल बुद्ध-महावीर से पूर्व माना जाता है।
इस ग्रन्थ का उल्लेख आश्वलायन गृह्यसूत्र में पहली बार आया है। भारत में हो गया
था। । प्रथम शताब्दी ईसवी में इसका प्रचार दक्षिण भारत में हो गया था।
महाभारत का सांस्कृतिक महत्त्व
महाभारत का महत्त्व सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत अधिक है।
यह अपने आप में संपूर्ण साहित्य है। इसके शान्तिपर्व में राजनीति के विषयों का
व्यापक एवं गम्भीर प्रतिपादन है। इसके पात्रों को व्यास ने उपदेश का आधार बनाया है, जिससे लोग कर्तव्य की शिक्षा ले सकें। यह
एक ऐसा धार्मिक ग्रन्थ है, जिसमें प्रत्येक श्रेणी का मनुष्य
अपने जीवन के अभ्युदय की सामग्री प्राप्त कर सकता है। बाणभट्ट ने व्यास को कवियों
का निर्माता कहा है, क्योंकि महाभारत से कवियों को काव्य
सृष्टि के लिए प्रेरणा मिलती रही है। गीता में कर्म, ज्ञान
और भक्ति का सुन्दर समन्वय है। महाभारत में व्यास ने कहा है कि धर्म शाश्वत है।
अतः इसका परित्याग किसी भी दशा में भय या लोभ से नहीं करना चाहिए। शान्ति पर्व में
कहा गया है कि राजधर्म के बिगड़ने पर राज्य तथा समाज का सर्वनाश हो जाता है। मानव
जीवन को धर्म, अर्थ और काम के द्वारा मोक्ष की ओर ले जाने की
प्रक्रिया महाभारत में अच्छी तरह बताई गई है। इसलिए धर्म, राजनीति,
दर्शन आदि सभी विषयों का यह अक्षय कोष है।
गीता
महाभारत के भीष्म पर्व के अन्तर्गत 18 अध्यायों तथा 700
श्लोकों में व्याप्त गीता एक स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में विश्वविख्यात है। युद्ध
के आरम्भ में युद्ध के भयावह परिणाम की कल्पना करके अर्जुन विषादग्रस्त हो जाते
हैं, तब उन्हें कर्म के लिए
प्रेरित करते हुए कृष्ण उपदेश देते हैं। भगवान् कृष्ण के द्वारा उपदिष्ट होने से
इसे मूलतः भगवद्गीता कहते हैं। यद्यपि अर्जुन को युद्ध के लिए प्रवृत्त करने का
उद्देश्य दो-तीन अध्यायों में ही पूरा हो गया था, किन्तु
जीवन की व्यावहारिक तथा आध्यात्मिक समस्याओं को सुलझाने के लिए अर्जुन के
प्रासंगिक प्रश्नों का उत्तर देने के कारण गीता का आकार बड़ा हो गया।
गीता के अध्यायों को योग कहा गया है। गीता में योग का
अर्थ है सम-दृष्टि (समत्वं योग उच्यते) अथवा कुशलतापूर्वक कर्म करना (योगः
कर्मसु कौशलम्) जिससे बन्धन न हो। गीता में मुख्य रूप से तीन योगों का
प्रतिपादन किया गया है- कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग। ये तीनों परस्पर सम्बद्ध तथा पूरक हैं।
कर्मयोग का अर्थ है, अपने निर्धारित कर्तव्यों का
निष्पादन, भौतिक लाभ की आशा रखे
बिना काम करना। इसे 'निष्काम कर्म' भी
कहा गया है। कामना से कर्म में आसक्ति होती है, जिससे बन्धन
की उत्पत्ति होती है। कृष्ण कहते हैं "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु
कदाचन" (तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल तुम्हारे वश में नहीं है।) ज्ञानयोग इसी की सिद्धि करता है। सर्वोपरि
ज्ञान यह है कि विश्व पर नियन्त्रण करने वाला परमात्मा (पुरुषोत्तम) है - 'वासुदेवः सर्वम्।' यह ज्ञान हो जाने पर ही
निष्काम कर्म संभव है, अन्यथा मनुष्य को स्वार्थ (सकाम कर्म)
से पृथक् नहीं किया जा सकता। कर्म, कर्मफल, प्रकृति आदि सब कुछ पुरुषोत्तम से नियन्त्रित होकर चल रहा है।
भक्तियोग परमात्मा को ही सर्वस्वसमर्पण का नाम है। इसे
योग-दर्शन में 'ईश्वर-
प्रणिधान' कहते हैं। अपने सभी कर्मों को ईश्वरार्पण की
दृष्टि से करें, तो मानव कभी असत्कर्म नहीं कर सकता। गीता का
वाक्य है- 'तत्कुरुष्व मदर्पणम्।'
भगवद्गीता पर संस्कृत में अनेक टीकाएँ लिखी गई हैं। विश्व
की प्रायः सभी भाषाओं में इसके अनुवाद,
टीका, विवेचन, निबन्ध,
भाष्य आदि लिखे गए हैं। यह संसार के सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रन्थों में
है।
महाभारत एवं आधुनिक समाज
महाभारत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह एक शाश्वत
धर्म- व्यवस्था का विधान करता है। यह शाश्वत धर्म व्यवस्था, अनेक दृष्टियों से भिन्न होते हुए भी
अभिन्न रूप वाली है। इस तथ्य को इस रूप में समझा जा सकता है कि महाभारतकार धर्म को
रूढ़ व्यवस्था नहीं मानते। वह उसे बदलते समाज एवं काल के साथ परिवर्तनीय स्वीकार
करते हैं।
मनुस्मृति एवं रामायण आदि में प्रतिपादित धर्म प्रायः
रूढ़ हैं जिनका उल्लंघन करने पर मनुष्य पाप का भागीदार बनता है। परन्तु महाभारतकार
का कहना है कि धर्म का निर्णय देश,
काल तथा व्यक्ति के अनुसार होता है। अतः उसे रूढ़ नहीं माना जा
सकता। शाश्वत धर्म को वेदव्यास भी मानते हैं जो त्रिकालाबाधित है तथा सदैव एकरूप
ही रहता है। उसका उल्लंघन अवश्य ही क्षम्य नहीं। परन्तु प्रत्येक युग का भी एक
विशिष्ट धर्म होता है जिसे युगधर्म कहा जाता है। इसी प्रकार आपद्धर्म तथा
व्यक्तिधर्म भी होते हैं।
इस प्रकार महाभारत आज के समाज को धर्मभीरु नहीं, प्रत्युत धर्म के प्रति आश्वस्त बनाता
है। 'पञ्चानृतान्याहुरपातकानि' कहकर
पितामह भीष्म मानो आज के समाज को आश्वस्त करते हैं कि धर्म हमारा सन्तापक वैरी
नहीं, प्रत्युत सन्मित्र है, जो
प्रत्येक परिस्थिति में हमारी रक्षा करता है।
स्मृति-ग्रन्थ
स्मृति ग्रंथ,
भारतीय परंपरा के वे ग्रंथ हैं जिन्हें किसी ऋषि ने आचार संहिता और
विधि विधान के रूप में लिखा या संकलित किया है। माना जाता है कि परंपरा का संकलन
किए जाने के कारण इन्हें स्मृति कहा जाता है। मनु स्मृति की अचरसंहित और समाज एवं
समाजिक व्यवस्था इस प्रकार से हैं –
वर्णाश्रम
वर्णव्यवस्था - ऋग्वेद के
पुरुष सूक्त में कहा गया है—
ब्राह्मणोऽस्य
मुखमासीत बाहूराजन्यः कृतः ।
उरूतदस्य
यद्वेश्यं पद्भ्याँ शूद्रो अजायत ॥
आशय यह कि उस विराट पुरुष के मुख,
भुजाओं, जंधों और पैरों से क्रमश: ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्गों की
उत्पत्ति हुई है। श्रीमद्भग गीता में कहा गया है कि गुण और कर्मों के विभाग से
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र
अविनाशी परमेश्वर के द्वारा रचे गये हैं।
चातुर्वर्ण्य
मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्यकतरिमपि
मां विद्धयकर्तारमव्ययम् ॥
श्रीमद्भगवतगीता में आगे
कहा गया है कि जिन चार वर्णों की परमेश्वर से सृष्टि हुई है उनके अलग स्वभाव हैं।
उनमें से अन्तःकरण का निग्रह, इन्द्रियों
का दमन, बाहर-भीतर की शुद्धि, धर्म के
लिए कष्ट सहन करना, क्षमाभाव, मन,
इन्द्रिय एवं शरीर की सरलता, आस्तिबुद्धि,
शास्त्रविषयक ज्ञान और परमात्मा का अनुभव ब्राह्मण का स्वभाव है।
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता, युद्ध में स्थिर रहना, दान और स्वामीभाव क्षत्रिय का स्वभाव है। खेती, गोपालन,
क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार यह वैश्य का स्वभाव है। सभी वर्णो की
सेवा करना शूद्र का स्वभाव है।
शमो
दमस्तपः शौचं क्षान्तिराजंवमेव च ।
ज्ञानं
विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।
शौर्य
तेजोधृतिर्वाक्ष्यं युद्ध चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावच
क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥
कृषि
गौरक्ष्य वाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचयत्मिकं
कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥
इसी बात को गौतम ने
मिताक्षरा में कहा है- ब्राह्मणस्याधिकं लब्धम् क्षत्रियस्य विजितम् निर्विष्टं
वैश्यशूद्रयोः।
चार वर्णाश्रम का समय हैं–
· ब्रह्मचर्याश्रम - 25
वर्ष तक ऋषि के साथ रहकर शिक्षाग्रहण इसमें मनुष्य के सम्पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक
विकास होता करना।
· गृहस्थ आश्रम - 25 से 50 तक
उचित उपायों द्वारा धनोपार्जन तथा संयमित सुख-भोग काल होता है।
· वानप्रस्थ आश्रम - 50
से 75 वर्ष तक इस काल में समाज संग तथा योग आदि क्रिय करके अंतिम आश्रम के लिए
तैयार होना।
· संन्यास आश्रम - 75
से 100 वर्ष तक अपनी अध्यात्मिक उन्नति एवं मुक्ति के लिए प्रयास।
वैदिक एवं लौकिक साहित्य का उद्देश्य
वैदिक और लौकिक साहित्य के उद्देश्य इस प्रकार हैं –
· वैदिक साहित्य से तत्कालीन समाज की
प्रवृत्तियों को समझने में मदद मिलती है।
· इसमें धार्मिक विषयों में यज्ञ, देवता, उनके स्वभाव,
भेद आदि का ज्ञान होता हैं।
· लौकिक विषयों में मानव की इच्छाएं, संकट और उनके निवारण, समाज का स्वरूप, चिकित्सा, दान,
विवाह आदि को समझने में मदद मिलती है।
· लौकिक साहित्य में गेयता और
संगीतात्मकता का समावेश होता है. इसमें नख-शिख वर्णन, विरह के विभिन्न रूप, विरहिणी नायिका द्वारा प्रियतम के पास सन्देश प्रेषण जैसे आयाम होते हैं।
· लौकिक साहित्य में बोली भाषा का प्रयोग
होता है। इसमें तत्कालीन काव्य-भाषा की अपेक्षा जन-बोलियों का प्रयोग होता है।
· लौकिक संस्कृत साहित्य प्रधान रूप से धार्मिक-धर्ममनिरपेक्ष
है. इसे लोक-परलोक से सम्बन्धित कहा जा सकता है।
ध्यातव्य बिन्दु
· वैदिक साहित्य धार्मिक एवं लौकिक विषयों
से लिखित बहुमूल्य साहित्यिक परम्परा।
· वैदिक साहित्य का विकास काल 6000 ई. पू.
से 800 ई. पू. है।
· वैदिक साहित्य के विकास के चार चरण - (i) संहिता, (ii) ब्राह्मण,
(iii) आरण्यक एवं (iv) उपनिषद्.
· संहिता - वैदिक मन्त्रों का सङ्ग्रह।
· संहिता के चार मुख्य रूप (ⅰ)
ऋग्वेद संहिता, (ii) यजुर्वेदसंहिता,
(iii) सामवेद संहिता एवं (iv) अथर्ववेदसंहिता।
· यज्ञ के चार ऋत्विज - (i) होता, (ii) अध्वर्यु,
(iii) उद्गाता एवं (iv) ब्रह्मा।
· सूत्र-साहित्य - कर्मकाण्ड से सम्बद्ध कल्प-ग्रन्थ।
· सूत्र साहित्य के मुख्य चार भेद (i) श्रौत, (ii) गृह्य,
(iii) धर्म एवं (iv) शुल्व।
· ऋग्वेद - ऋचाओं का संकलन एवं सप्तसिन्धु
प्रदेश की तात्कालिक सभ्यता और संस्कृति का चित्रण करने वाला अद्वितीय ग्रन्थ।
समय - 6000 ई. पू. से 1200 ई. पू. (विभिन्न विद्वानों के मतानुसार)
मण्डल - 10
सूक्त - 1028
ऋचाओं की संख्या - 10580
ऋग्वेद की उपलब्ध शाखाएँ शाकल, आश्वलायन एवं शांखायन।
· यजुर्वेद - अनुष्ठान विषयक संहिता।
यजुर्वेद के दो रूप - (i) कृष्णयजुर्वेद एवं (ii) शुक्लयजुर्वेद।
कृष्णयजुर्वेद की प्रसिद्ध शाखा तैत्तिरीय संहिता।
कृष्णयजुर्वेद की अन्य संहिताएँ- (i) मैत्रायणी, (ii) काठक
एवं (iii) कपिष्ठल।
शुक्लयजुर्वेद की प्रसिद्ध शाखा वाजसनेयी संहिता
शुक्लयजुर्वेद में अध्याय - 40
· सामवेद उत्पत्ति हुई मन्त्रगानयुक्त एवं
छन्दोबद्ध रचना। इसी वेद से सङ्गीत शास्त्र की
सामवेद की प्रसिद्ध शाखा - कौथुम शाखा।
· अथर्ववेद वाणिज्य, अभिचार आदि से सम्बद्ध-मन्त्रों का
संकलन। अध्यात्म विद्या, शत्रुनाश, आरोग्य-प्राप्ति,
कृषिवृद्धि, विवाह,
अथर्ववेद का अन्य नाम - अथर्वाङ्गिरस वेद।
ऋषि - अथर्वा और अङ्गिरा।
'ब्रह्मन्' अर्थात्
वेद (ब्रह्म) से सम्बद्ध। वैदिक मन्त्रों की ब्राह्मण ग्रन्थ कर्मकाण्डपरक व्याख्या
करने वाला ग्रन्थ।
काण्ड - 20
सूक्त - 731
मन्त्र - 5849
· ऋग्वेद- संहिता से ने सम्बद्ध ब्राह्मण
ग्रन्थ – - (i) ऐतरेय
ब्राह्मण एवं (ii) कौषीतकी ब्राह्मण।
· शुक्लयजुर्वेद का ब्राह्मण- शतपथ।
· कृष्णयजुर्वेद का ब्राह्मण तैत्तिरीय।
· ताण्ड्य, षड्विंश, जैमिनीय इत्यादि। सामवेद से
सम्बद्ध ब्राह्मण-ग्रन्थ
· अथर्ववेद का ब्राह्मण-ग्रन्थ - गोपथ।
· आरण्यक - ऋषियों के वैदिक कर्मकाण्ड से
सम्बद्ध चिन्तन प्रधान ग्रन्थ।
उपलब्ध आरण्यक
I. ऋग्वेदीय- (i) ऐतरेय
एवं (ii) कौषीतकि।
II. यजुर्वेदीय- (i) बृहदारण्यक,
(ii) तैत्तिरीय एवं (iii) मैत्रायणीय।
III. सामवेदीय - (i) जैमिनीय
एवं (ii) छान्दोग्य।
· उपनिषद् - वैदिक साहित्य के ज्ञानप्रधान
आध्यात्मिक ग्रन्थ।
· उपनिषद् के विषय - आत्मा, जीव, जगत्, ईश्वर, ब्रह्म, मोक्ष आदि पर
विचार।
· मुख्य उपनिषद् – 13
· ईशावास्योपनिषद्, केनोपनिषद्, कठोपनिषद्,
प्रश्नोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद्, तैत्तरीयोपनिषद्, ऐतरेयोपनिषद्, छान्दोग्योपनिषद्, बृहदारण्यकोपनिषद्, श्वेताश्वतरोपनिषद्, कौशितकी उपनिषद्, मैत्रायणी उपनिषद्।
· वेदाङ्ग - वैदिक मन्त्रों के उच्चारण, अर्थबोध तथा उपयोग हेतु निर्मित ग्रन्थ।
· वेदाङ्ग के छः भेद –
1) शिक्षा (उच्चारण की विधि)
2) कल्प (कर्मकाण्ड तथा आचार)
3) व्याकरण (शब्दों की व्युत्पत्ति)
4) निरुक्त (वैदिक शब्दों का निर्वचन तथा
व्याख्या)
5) ज्योतिष (यज्ञ के काल निरूपण)
6) छन्द (अक्षरों की गणना के आधार पर
पद्यात्मक मन्त्रों के स्वरूप का निर्धारण तथा नामकरण)
अभ्यास-प्रश्न
प्र. 1. वैदिक साहित्य के विकास का समय बताइए।
प्र. 2. संहिता किसे कहते हैं?
मुख्य संहिताओं के नाम लिखिए। प्र. 3. ऋत्विजों के नाम तथा कार्यों
का उल्लेख कीजिए।
प्र. 4. ब्राह्मणग्रन्थों की रचना का उद्देश्य क्या था?
प्र. 5. किन ग्रन्थों से वानप्रस्थ आश्रम का सम्बन्ध था?
प्र. 6. उपनिषदों को वेदान्त क्यों कहते हैं? प्र. 7. वेदाङ्ग किसे कहते हैं तथा इसके अन्तर्गत किन-किन
शास्त्रों को लिया गया है?
प्र. 8. कल्पसूत्र के मुख्य भेदों के नाम लिखिए।
प्र. 9. ऋग्वेद में आर्यों की किन भावनाओं का संग्रह है? be republished
प्र. 10. ऋग्वेद में कितने मण्डल हैं?
प्र. 11. सूक्त किसे कहते हैं?
प्र. 12. ऋग्वेद के सूक्तों की संख्या बताइए।
प्र. 13. ऋग्वेद में ऋचाओं की कुल संख्या कितनी है?
प्र. 14. ऋग्वेद में किस मण्डल की ऋचाएँ सबसे पुरानी मानी जाती हैं?
प्र. 15. आर्य लोगों ने ऋग्वेद में किन-किन देवताओं को प्रमुख स्थान दिया? प्र. 16. ऋग्वेद में मुख्यतः किन लौकिक
विषयों का वर्णन मिलता है?
प्र. 17. सृष्टि प्रक्रिया का वर्णन ऋग्वेद में कौन से सूक्त में किया गया
है।
प्र. 18. यजुर्वेद की मुख्य शाखाएँ बताइए।
प्र. 19. शुक्लयजुर्वेद की प्रसिद्ध शाखा का नाम लिखिए।
प्र. 20. यजुर्वेद की अधिक लोकप्रियता का क्या कारण है?
प्र. 21. सामवेद के मन्त्रों का गायन कौन-सा ऋत्विक् करता है?
प्र. 22. सामवेद के किन गानों की संख्या सर्वाधिक है?
प्र. 23. सामवेद के विषय में 50 शब्दों में लिखिए।
प्र. 24. वेदत्रयी में गिने जाने वाले वेदों के नाम बताइए।
प्र. 25. अथर्ववेद के रचयिता कौन थे?
प्र. 26. अथर्ववेद के मन्त्रों में किन-किन बातों का वर्णन है?
प्र. 27. ब्राह्मण ग्रन्थों से क्या तात्पर्य है?
प्र. 28. ऋग्वेद संहिता से सम्बद्ध ब्राह्मण के नाम लिखिए।
प्र. 29. ऐतरेय ब्राह्मण किसकी रचना है?
प्र. 30. ब्राह्मण ग्रन्थों में सबसे बड़ा कौन-सा ग्रन्थ है?
प्र. 31. याज्ञवल्क्य ने शुक्लयजुर्वेद की प्राप्ति कैसे की?
प्र. 32. ब्राह्मण ग्रन्थों में किन विषयों का वर्णन हुआ है?
प्र. 33. आरण्यकों की रचना कहाँ हुई?
प्र. 34. आरण्यकों में किन विषयों की चर्चा की गई है?
प्र. 35. मुख्य आरण्यक ग्रन्थों के नामों का उल्लेख कीजिए।
प्र. 36. शॉपेनहावर ने उपनिषदों के विषय में क्या कहा था?
प्र. 37. मौलिक उपनिषदों की संख्या कितनी थी? उनके नाम लिखिए।
प्र. 38. यम-नचिकेता का संवाद किस उपनिषद् में है?
प्र. 39. उपनिषदों के आधार पर कौन-से दर्शन का विकास हुआ?
प्र. 40. ब्रह्मसूत्र के रचयिता कौन थे?
प्र. 42. उपनिषदों का प्रथम भाष्य किसने लिखा है?
प्र. 43. निरुक्त का संकलन क्यों किया गया?
प्र. 44. वेदाङ्ग शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए ?
प्र. 45. प्रातिशाख्य नामक ग्रन्थ में किसका वर्णन मिलता है ?
प्र. 46. कल्प से आप क्या समझते हैं तथा उसके मुख्य भेद कौन-कौन से हैं? प्र. 47. गृह्याग्नि में होने वाले
संस्कारों का वर्णन किस सूत्र में किया गया है?
प्र. 48. परिशिष्ट ग्रन्थों की रचना क्यों की गई?
प्र. 49. उपजीव्य काव्य किसे कहते हैं?
प्र. 50. रामायण और
महाभारत किन दृष्टियों से भिन्न हैं?
प्र. 51. रामायण के
रचयिता कौन हैं?
प्र. 52. अभी रामायण
के कितने संस्करण उपलब्ध हैं?
प्र. 53. रामायण की
रचना का काल किस शताब्दी में माना जाता है?
प्र. 54. रामायण में
कितने काण्ड हैं? प्रत्येक का नाम लिखिए।
प्र. 55. रामायण में
कितने श्लोक हैं?
प्र. 56. वाल्मीकि ने
रामायण में जीवन के किन आदर्शों को प्रस्तुत किया है?
प्र. 57. महाभारत को
शतसाहस्रीसंहिता क्यों कहते हैं?
प्र. 58. कौन-सा
विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक ग्रन्थ महाभारत का अंश है?
प्र. 59. महाभारत के
लेखक कौन हैं?
प्र. 60. महर्षि
व्यास का दूसरा नाम क्या है?
प्र. 61. महाभारत के
विकास के चरणों के नाम बताइए?
प्र. 62. महाभारत
कितने पर्वों में बँटा हुआ है?
प्र. 63. गीता
महाभारत के किस पर्व में है?
प्र. 64. वर्णव्यवस्था
को समझाइए?
प्र. 65. आश्रम
व्यवस्था को समझाइए?
[1] वैदिक साहित्य में पंजाब को 'सप्त सिंधु' कहा जाता था. इसका मतलब था, पाँच नदियों की भूमि के बजाय सात नदियों की भूमि. वैदिक काल में पंजाब में
सात नदियों द्वारा अपवाहित क्षेत्र पाया जाता था. ये नदियाँ हैं- सतलुज, झेलम, रावी, ब्यास, चिनाब, सरस्वती और सिंधु।
[2] ईशावास्योपनिषद्, केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्,
मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद्, तैत्तरीयोपनिषद्, ऐतरेयोपनिषद्, छान्दोग्योपनिषद्, बृहदारण्यकोपनिषद्, श्वेताश्वतरोपनिषद्, कौशितकी उपनिषद्, मैत्रायणी उपनिषद्।