विश्वदृष्टि में हिंदु – डाकू, लुटेरा, चोर, दास या फिर कुछ ओर ?
विश्वदृष्टि में हिंदु – डाकू, लुटेरा, चोर, दास या फिर कुछ ओर ?
इस विषय की गम्भीरता को देखते हुए इसका विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर किया जाना उचित जान पड़ता है -
विश्व में आर्य संस्कृति और उसका प्रभाव
आर्य संस्कृति का प्राचीन समय में इतना व्यापक
और प्रबल प्रभाव था कि उसके पड़ोसी देश भी उसकी महानता को मानते थे। यह संस्कृति
भारतीयों के प्रति आदर भाव उत्पन्न करने वाली थी, और इसने पूरे
क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई।
वेदव्यास और जरथुस्त्र का शास्त्रार्थ
वेदव्यास और जरथुस्त्र के बीच हुए शास्त्रार्थ
का उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि आर्य संस्कृति का प्रभाव केवल भारतीय उपमहाद्वीप
तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यह ईरान तक भी पहुँच चुका था। वेदव्यास
स्वयं ईरान गए थे, जो दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति के विद्वान
अन्य संस्कृतियों के साथ संवाद स्थापित करने में सक्षम थे।
"हिन्दू" शब्द की व्युत्पत्ति
"सैंधव" से "हिन्दू" शब्द
की व्युत्पत्ति यह सिद्ध करती है कि प्राचीन काल में "हिन्दू" का अर्थ
नकारात्मक नहीं था। यह लोग न तो "डाकू," "सेवक,"
"दास," "नास्तिक," और न
"पहरेदार" थे। अगर ऐसा होता, तो शब्द की व्युत्पत्ति इन व्यापारों
से संबंधित धातुओं से होती।
यह स्पष्ट है कि ये अर्थ बाद में विकसित हुए,
जब
भारतीय और पारसी राज्यों के बीच पारस्परिक विरोधभाव बढ़ने लगा और सीमाओं पर
अव्यवस्था फैल गई।
लूट और दासता की स्थिति
सीमाओं पर परस्पर लूट और दास बनाने की स्थिति
इतनी लंबे समय तक बनी रही कि पारसी लोग भारतीय बंदियों को दास और सेवक मानने लगे।
समय के साथ, ये दास और सेवक उन लुटेरों से बचाने के लिए
"पहरेदार" बन गए।
भारतीयों की ईमानदारी विश्वविख्यात थी, और
उनका "पहरेदार" होना स्वाभाविक था। "लुटेरा," "सेवक,"
"दास," और "पहरेदार" ये चारों अर्थ
सापेक्ष हैं, जैसे संस्कृत में "दस्यु" (डाकू) और
"दास" (गुलाम) सापेक्ष अर्थ हैं।
निष्कर्ष
इस प्रकार, "हिन्दू"
शब्द की व्युत्पत्ति और आर्य संस्कृति के प्रभाव को समझने से यह स्पष्ट होता है कि
यह संस्कृति न केवल अपने समय में महान थी, बल्कि उसने अपने पड़ोसी देशों पर भी
गहरा प्रभाव डाला। भारतीयों की ईमानदारी और साहस सदैव उनकी पहचान का हिस्सा रहे
हैं।
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