मनुस्मृति का विरोध क्यों ?
मनुस्मृति का विरोध क्यों होना चाहिए ?
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्थ्य च प्रियमात्मनः
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥ (मनुः 2/12)
श्रुति, स्मृति, सदाचार, और आत्मा को संतोष देना, यही चार मुख्य लक्षण हैं जो धर्म की पहचान के रूप में जाने जाते हैं। भारत में, इन चारों को धर्मानुकूल मार्ग का संकेतक माना गया है। भारत के बाहर भी, ये चार लक्षण धर्माचरण के प्रमाण रहे हैं, हालांकि मुसलमानों के लिए "कुरआन-हदीस" और ईसाइयों के लिए "तौरेत-इंजील" इसके स्थान पर प्रमाण हैं। सदाचार और आत्मतोष को सारा सभ्य संसार प्रमाण मानता है, लेकिन यह विभिन्न देशों के अनुसार भिन्न हो सकता है।
भारत में जहां श्रुति-स्मृति के विरोध के उदाहरण हैं, जैसे चार्वाक के नास्तिक आचार्य, वहां जैनों की तरह अपनी-अपनी श्रुति और स्मृति का प्रमाण लिया गया है या केवल सदाचार और आत्मतोष को मान्यता दी गई है। कुछ लोग दार्शनिक दृष्टि से श्रुति-स्मृति का विरोध करते हैं, लेकिन समाज के आचरण और संगठन के संदर्भ में भारतीय प्रसिद्ध श्रुति-स्मृति का प्रमाण आज भी मान्य है।
वर्णाश्रम धर्म समाज को संगठित रखने वाली एक संस्था है, जिसका स्पष्ट प्रतिपादन स्मृतियों में हुआ है। नास्तिक मतों का इतना प्रचार नहीं हुआ कि समाज पर कोई गंभीर प्रभाव पड़े। बौद्धमत के प्रचार के दौरान "कर्मणावर्णः" के आधार पर सुधार हुए, लेकिन बाद में स्मृतियों के आधार पर समाज पुनः व्यवस्थित हो गया।
स्मृतियों का वर्णाश्रम धर्म सम्पूर्ण संसार के लिए एक आदर्श है, जिसका पालन रामराज्य जैसे आदर्श युगों में ही संभव था।
जातिरत्र महासर्प मनुष्यत्वे महामते ।
सङ्करात्सर्व वर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मतिः (महाभारत, वनपर्व, अ० 180)
स्मृतियों में धर्मोपदेश का सामान्य क्रम यह है कि पहले मनुष्य का साधारण धर्म वर्णन किया गया है, जिसे सभी मनुष्यों को निर्विवाद रूप से मानना उचित है। यह धर्म आस्तिक और नास्तिक दोनों पक्षों द्वारा स्वीकार किया जाता है। इसके बाद, समाज की स्थिति के अनुसार आश्रमों के कर्त्तव्यों का विभाग किया गया है, जो भारत और हिन्दू धर्म की विशेषता है।
इस विभाग में, प्रत्येक वर्ण के विभिन्न आश्रमों में प्रवेश और बनाए रखने के नियम हैं। इन नियमों का आरंभ गर्भाधान संस्कार से होता है और अंत अन्त्येष्टि तथा श्रद्धा पर विचार किया जाता है। भारत में इन संस्कारों के नियम थोड़े बहुत फेरबदल के साथ पालन किए जाते हैं। कुछ संस्कार, जैसे जन्म, विवाह और अन्त्येष्टि, ऐसे हैं जिनके नियम संसार भर में किसी न किसी भिक्ष, शास्त्रीय या अशास्त्रीय, रूप में मान्य हैं। भारत में, इन संस्कारों के आधार, सभी के लिए, कल्पसूत्र और स्मृतियाँ ही हैं।
सम्पूर्ण भारत में सभी मनुष्य इन संस्कारों को किसी न किसी रूप में मानते आए हैं। परलोक और जन्मान्तर को न मानने वाले हिन्दुओं ने स्वास्थ्य और सौंदर्य की दृष्टि से संस्कारों को स्वीकार किया है। परलोक और जन्मान्तर मानने वालों ने यह समझा कि गर्भाधान से उत्तम जीवात्मा का गर्भ में प्रवेश होता है।
.gif)
Comments
Post a Comment