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शोध के दो स्तंभ: प्रत्यक्षवाद (Positivism) और उत्तर-प्रत्यक्षवाद (Post-Positivism) को समझें सरल भाषा में

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 प्रत्यक्षवाद (Positivism) और उत्तर-प्रत्यक्षवाद (Post-Positivism)  जब हम किसी विषय पर शोध (Research) करते हैं, तो हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि "सत्य" या "ज्ञान" की खोज कैसे की जाए? इस दुनिया को देखने और समझने के लिए शोधकर्ताओं के पास अलग-अलग नजरिए होते हैं, जिन्हें शोध की भाषा में अनुसंधान प्रतिमान (Research Paradigm) या दर्शन कहा जाता है। यूजीसी नेट (UGC NET) पेपर-1 के दृष्टिकोण से, अनुसंधान प्रविधि (Research Aptitude) के अंतर्गत प्रत्यक्षवाद (Positivism) और उत्तर-प्रत्यक्षवाद (Post-Positivism) दो सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी अवधारणाएं हैं। आइए इन दोनों को बहुत ही सरल शब्दों और व्यावहारिक उदाहरणों के साथ समझते हैं। 1. प्रत्यक्षवाद (Positivism): "जो दिखता है, वही सच है" प्रत्यक्षवाद की शुरुआत 19वीं सदी में फ्रांसीसी दार्शनिक अगस्त कॉम्टे (Auguste Comte) द्वारा की गई थी। यह दृष्टिकोण पूरी तरह से पारंपरिक विज्ञान के नियमों पर चलता है। मूल सिद्धांत: वैज्ञानिक और अनुभवजन्य दृष्टिकोण:- प्रत्यक्षवाद मानता है कि इस दुनिया में केवल वही चीजें सच हैं जि...