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हिंदुओं, धर्म समझ लो वरना बाद में बहुत पछताएंगे !

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हिंदुओं, धर्म समझ लो वरना बाद में बहुत पछताएंगे  धर्म का अर्थ और महत्व धर्म शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में पहली बार किया गया है, जहां विष्णु के तीन पदों का वर्णन है: " त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्॥ "। इसका अर्थ है कि धर्म का अर्थ धारण करना है, और यह वेदों के अर्थ को पोषित करता है। किसी वस्तु या जीव की विकासशील और धारणीय वृत्ति को उसका धर्म कहा जाता है। धर्म का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की वह धारा है जो समाज और व्यक्ति के विकास को सुनिश्चित करती है। धर्म के अभाव में वस्तु या जीव का नाश होता है, और धर्म की वृद्धि से उसका उत्थान होता है। धर्म और संस्कार का विज्ञान धर्म की परिभाषा को वैशेषिक दर्शन में "यतोऽभ्युदय-निःश्रेयस-सिद्धिः स धर्मः" के रूप में देखा गया है, जिसका अर्थ है कि धर्म वह है जिससे उन्नति और परम सुख की प्राप्ति होती है। कर्ममीमांसा शास्त्र में धर्म का लक्ष्य "धर्मानुकूल आचरण" को माना गया है, जो कि व्यक्ति के कर्तव्यों के अनुकूल होना चाहिए। धर्म और संस्कार का संबंध केवल आध्यात्मिक नह...