शोध के दो स्तंभ: प्रत्यक्षवाद (Positivism) और उत्तर-प्रत्यक्षवाद (Post-Positivism) को समझें सरल भाषा में
प्रत्यक्षवाद (Positivism) और उत्तर-प्रत्यक्षवाद (Post-Positivism)
जब हम किसी विषय पर शोध (Research) करते हैं, तो हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि "सत्य" या "ज्ञान" की खोज कैसे की जाए? इस दुनिया को देखने और समझने के लिए शोधकर्ताओं के पास अलग-अलग नजरिए होते हैं, जिन्हें शोध की भाषा में अनुसंधान प्रतिमान (Research Paradigm) या दर्शन कहा जाता है।
यूजीसी नेट (UGC NET) पेपर-1 के दृष्टिकोण से, अनुसंधान प्रविधि (Research Aptitude) के अंतर्गत प्रत्यक्षवाद (Positivism) और उत्तर-प्रत्यक्षवाद (Post-Positivism) दो सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी अवधारणाएं हैं। आइए इन दोनों को बहुत ही सरल शब्दों और व्यावहारिक उदाहरणों के साथ समझते हैं।
1. प्रत्यक्षवाद (Positivism): "जो दिखता है, वही सच है"
- वैज्ञानिक और अनुभवजन्य दृष्टिकोण:- प्रत्यक्षवाद मानता है कि इस दुनिया में केवल वही चीजें सच हैं जिन्हें हम अपनी पांच इंद्रियों से देख, सुन, छू या महसूस कर सकते हैं और जिन्हें प्रयोगों (Experiments) द्वारा मापा जा सकता है।
- पूर्ण वस्तुनिष्ठता (Absolute Objectivity):- इसमें शोधकर्ता (Researcher) और शोध का विषय एक-दूसरे से पूरी तरह अलग होते हैं। शोधकर्ता की अपनी भावनाएं, विचार या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि शोध के परिणामों को प्रभावित नहीं कर सकते।
- निश्चित नियम:- जैसे भौतिकी (Physics) में गुरुत्वाकर्षण का नियम हर जगह समान रूप से लागू होता है, वैसे ही प्रत्यक्षवाद मानता है कि मानव समाज के भी कुछ निश्चित नियम होते हैं जिन्हें डेटा के जरिए खोजा जा सकता है।
- मात्रात्मक शोध (Quantitative Research):- इसमें डेटा इकट्ठा करने के लिए सांख्यिकी (Statistics), गणितीय गणना, सर्वेक्षण (Surveys) और प्रयोगशाला प्रयोगों का उपयोग किया जाता है।
2. उत्तर-प्रत्यक्षवाद (Post-Positivism): "सत्य है, लेकिन हमारी सीमाएं हैं"
मूल सिद्धांत
- संशोधित यथार्थवाद (Critical Realism):- उत्तर-प्रत्यक्षवादी मानते हैं कि सत्य (Truth) इस दुनिया में मौजूद तो है, लेकिन इंसानी सीमाओं, पूर्वाग्रहों और तकनीकी कमियों के कारण हम उसे 100% सटीकता से नहीं जान सकते। हमारा ज्ञान हमेशा सुधार के दायरे में रहता है।
- असत्यता का सिद्धांत (Principle of Falsifiability):- कार्ल पॉपर के अनुसार, हम किसी सिद्धांत को हमेशा के लिए "परम सत्य" साबित नहीं कर सकते। हम बस यह साबित कर सकते हैं कि वह सिद्धांत अभी तक गलत (False) साबित नहीं हुआ है।
- विषयपरकता की स्वीकार्यता (Subjectivity):- यह दृष्टिकोण स्वीकार करता है कि शोधकर्ता भी एक इंसान है। उसकी अपनी पृष्ठभूमि, संस्कृति और सोच अनजाने में ही सही, शोध को थोड़ा बहुत प्रभावित कर सकती है।
- मिश्रित विधि (Mixed Methods):- यह केवल आंकड़ों (Numbers) पर निर्भर नहीं रहता। यह मात्रात्मक के साथ-साथ गुणात्मक (Qualitative) तरीकों जैसे- साक्षात्कार (Interviews), केस स्टडी और अवलोकन (Observation) को भी शामिल करता है।
|
विशेषता |
प्रत्यक्षवाद (Positivism) |
उत्तर-प्रत्यक्षवाद (Post-Positivism) |
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जनक/मुख्य
विचारक |
अगस्त
कॉम्टे (Auguste
Comte) |
कार्ल
पॉपर (Karl
Popper) |
|
सत्य की
प्रकृति |
निश्चित, स्थिर और पूर्ण सत्य (Absolute Truth) |
संशोधित सत्य, जिसमें बदलाव की गुंजाइश है |
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शोध की
प्रकृति |
पूरी तरह
मात्रात्मक (Quantitative) |
मिश्रित
विधि (मात्रात्मक + गुणात्मक) |
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शोधकर्ता
की भूमिका |
पूरी तरह से तटस्थ और अलग (Objective) |
सहभागी और व्याख्यात्मक (Subjective) |
|
मुख्य
उद्देश्य |
सार्वभौमिक
नियमों का निर्माण करना |
गहराई से
संदर्भ और मानवीय व्यवहार को समझना |
संक्षेप में कहें तो, प्रत्यक्षवाद एक कठोर वैज्ञानिक चश्मा है जो हर चीज को गणित और आंकड़ों के तराजू में तोलता है। वहीं, उत्तर-प्रत्यक्षवाद एक लचीला और व्यावहारिक चश्मा है जो विज्ञान का सम्मान तो करता है, लेकिन इंसानी स्वभाव की जटिलताओं और सामाजिक संदर्भों को भी उतनी ही अहमियत देता है।
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